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लोग कह उठें शाबा शाबा बाबाजी

दहशत-वहशत, ख़ूनखराबा  बाबाजी

गुंडई  ने है  अमन को चाबा बाबाजी
 
काम से ज़्यादा संसद में अब होता है
हल्ला-गुल्ला, शोर-शराबा  बाबाजी

मैक्डोनाल्ड में रौनक बढती जाती है
उजड़ रहा पंजाबी ढाबा बाबाजी

मन मधुबन के भीतर सारे तीरथ हैं 
काशी-वाशी , क़ाबा-वाबा बाबाजी

देश समूचा खा कर ही पिंड छोड़ेंगे
दिल्ली पर जिनका है ताबा बाबाजी

कवि हो तो 'अलबेला' ऐसा गीत लिखो
लोग कह उठें  शाबा शाबा बाबाजी

  जय हिन्द !

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Comment

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Comment by Albela Khatri on June 5, 2012 at 3:09pm

शुक्रिया वीनस जी,
आपका शाबा शाबा पद्मश्री से कम नहीं

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 5, 2012 at 3:02pm

वाह...वाह अलबेला जी बढ़िया रचना । मज़ा आ गया !

Comment by वीनस केसरी on June 5, 2012 at 2:32pm
शाबा शाबा
Comment by Albela Khatri on June 5, 2012 at 9:43am

शुक्रिया संदीप कुमार पटेल जी

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 5, 2012 at 9:19am

बेहतरीन रचना सर जी क्या बात है वाह वाह जी ...............................बेहद सुन्दर विचारों से भरी ग़ज़ल के लिए आपको साधुवाद

कृपया ध्यान दे...

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