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ये मदिरा है बहुत नशीली बाबाजी

तेज़ हवा और एक ही तीली बाबाजी
फिर भी हमने  बीड़ी पी ली बाबाजी

घर की सादी छोड़ के बाहर मत ढूंढो
रंग-रंगीली, छैल-छबीली बाबाजी

रूप के रस में जो डूबा वो न उबरा
ये मदिरा है बहुत नशीली बाबाजी

नेताओं के मुख-मण्डल पर लाली है
अपनी आँखें गीली गीली बाबाजी

केवल पगड़ी नहीं, मुझे तो लगती है
पी.एम. की पतलून भी ढीली बाबाजी

कितना भी खींचो इसको, ना टूटेगी
महंगाई है चीज़ लचीली बाबाजी

जिसने सबको अमृत बांटा 'अलबेला'
लाश उसी की मिली है नीली बाबाजी

जय हिन्द !


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Comment by Albela Khatri on June 6, 2012 at 6:45pm

बहुत बहुत धन्यवाद  अरुण कान्त शुक्ला जी,
आपकी बधाई सर आँखों पर 

Comment by Albela Khatri on June 6, 2012 at 6:22pm

बहुत बहुत  शुक्रिया  जगदानन्द  झा 'मनु' साहेब,
धन्यवाद

Comment by Albela Khatri on June 6, 2012 at 6:16pm

एक बार फिर आपकी भीनी भीनी  सराहना के लिए झीनी झीनी कृतज्ञता राजेश कुमारी जी,
आपकी टिप्पणी से जोश दूना हो गया

Comment by जगदानन्द झा 'मनु' on June 6, 2012 at 5:04pm

बहुत शानदार  गजल , बहुत-बहुत  बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 6, 2012 at 4:24pm

बहुत बहुत शानदार प्रस्तुति अलबेला जी मजा आ गया पढ़ के बस कहिये धमाल ,कमाल 

Comment by अरुण कान्त शुक्ला on June 6, 2012 at 3:20pm

नेताओं के मुख-मण्डल पर लाली है
अपनी आँखें गीली गीली बाबाजी ,

शानदार ढंग से कही गयी बात .. बधाई .

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 6, 2012 at 1:37pm

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , बधाई.

Comment by Albela Khatri on June 6, 2012 at 8:01am

आपको पसन्द आई...ये मेरे लिए बहुत ही ख़ुशी की बात है
शुक्रिया  इस सराहना और हौसलाअफज़ाई के लिए बन्धुवर आशीष यादव जी.........आभार

Comment by Albela Khatri on June 6, 2012 at 7:57am

शुभ प्रभात  डॉ  सूर्य बाली 'सूरज' जी,


मुझ जैसे नये रंगरूट के लिए आपकी  दाद का वही महत्व है जो पाँच रूपए के नोट  पर गांधी जी के फोटो का है . सूरज अगर दीपक की लौ  का बखान करे तो ये अद्भुत  होता है.....

शुक्रिया ....धन्यवाद...आभार ...जय हिन्द

Comment by आशीष यादव on June 6, 2012 at 7:27am
आदरणीय अलबेला जी, कमाल की रचना है धमाल मचा रही है। आदमी हँसी-हँसी मे बहुत कुछ सीख सकता है आपकी रचनाओँ से।

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