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ग़मगीन

तक़दीर ही अपनी ऐसी थी
अपने हिस्से में गम निकले
जब भी कोशिश की हँसने की
आँख से आँसू बह निकले
अतीत नें पीछा छोड़ा न
न अपनों नें ही जीने दिया
खुदा से अब तो यही दुआ है
हँसते हँसते ही दम निकले

दीपक 'कुल्लुवी
'७/७/१२.

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Comment by Deepak Sharma Kuluvi on July 10, 2012 at 10:28am
रेखा जी और भ्रमर जी शुक्रिया.......
मुझको मेरे  किस ज़ुर्म की सजा देते हो
आप तो मेरे अश्कों से भी मज़ा लेते हो
हम मुहब्बत के लिए जीते रहे और मर भी गए
आप मुझको नहीं खुद को भी दगा देते हो
Comment by Rekha Joshi on July 7, 2012 at 6:52pm

दीपक जी ,दर्द में डूबी हुई रचना 

दो पंक्तिया मेरी ओरसे 
पोंछ के आँखों से बहते आंसू ,
भुला के अतीत के वो सारे गम ,
आगे बढ़ो ,जिंदगी बहुत हसीं है |,शुभकामनाएं  
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 7, 2012 at 6:24pm

दीपक जी ये जिन्दगी एक पहेली है ही न जाने कब क्या किसके हिस्से आये ..हाँ ख्वाइश बहुत अच्छी है हँसते मुस्कुराते जीना और विदा हो जाना ...सुन्दर रचना ..

भ्रमर ५ 
भ्रमर का दर्द और दर्पण 

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