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क्या तुम समझ रहे हो मेरी शायरी की बात ????




उंगलियाँ

जिस दिन से उसकी ज़ुल्फ़ से महरूम हो गयीं
उस दिन से मुझे हाथ में खलती है उंगलियाँ
दस्त -ऐ -करम से उसके यकीं हो गया मुझे
किस्मत किसी की कैसे बदलती है उंगलियाँ


बद -किस्मती

वो है मेरा रफ़ीक मै उसका रकीब हु ,
दुनिया समझ रही है मै उसके करीब हु .
चाह था जिसने मुझको मै उसका न हो सका ,
मै बदनसीब हु मै बहुत बदनसीब हु :


ता -उस्सुरात-ऐ -इश्क

कोई तो बात है जिसको छुपाते रहते हो
के अपने आप से नज़रें चुराते रहते हो
ज़रूर दिल में मोहब्बत किसी की जागी है
बगैर बात के जो मुस्कुराते रहते हो

शिकायत

मेरी रुसवाई कर के तुम मुझे इनआम दे देते ,
अगर मुझ से शिकायत थी मुझे इलज़ाम दे देते .
वफ़ा तो कर न पाए बेवफाई भी न कर पाए ,
कोई इक काम तो तुम ठीक से अंजाम दे देते .

एक बात

तारीकियों से करते है यूँ रौशनी की बात ,
जैसे के कातिलो से करें ज़िन्दगी की बात .
दुनिया उड़ा रही है मेरी बात का मज़ाक .
क्या तुम समझ रहे हो मेरी शायरी की बात ?

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Comment

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Comment by Hilal Badayuni on October 6, 2010 at 3:49pm
bahut bahut shukriya ganesh ji ashish ji
aap log isi tarah muhabbato se nawaziye mai yu hi likhta rahunga

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 6, 2010 at 9:20am
तारीकियों से करते है यूँ रौशनी की बात ,
जैसे के कातिलो से करें ज़िन्दगी की बात .
दुनिया उड़ा रही है मेरी बात का मज़ाक .
क्या तुम समझ रहे हो मेरी शायरी की बात ?

वाह वाह या बात है, "क्या तुम समझ रहे हो मेरी शायरी की बात ?"
बहुत खूब, बधाई हेलाल भाई इस बेहतरीन क़तात के लिये ,
Comment by आशीष यादव on October 6, 2010 at 6:36am
waah hilal ji. aap ki shayari ka to mai diwana ho gaya. mai ye kah sakta hu ki aap ki shayari ki baat hr koi samajh sakega. itni hridaysparshi hai ki kya kahe.

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