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एक दिन बिजली के जाने पर
ढूंढ रहा था
प्रकाश का साधन
करने को
तमस निस्तारण
तभी हाथों से
कोई चीज टकराई
देखा
पुराना दीया
जिस पर हरा काला
मैल बैठा हुआ
झंकृत कर गया मुझे
याद मेरे बचपन का
इसी दीये तले
पाया ज्ञान का प्रकाश
मैं क्या
मुझसे भी पहले
औरों ने भी इसी दीये
के आँचल तले
आँखों को काले धुँए में
झोंकते हुए
पाया अपने लक्ष्य को
वही दीया न जाने
देता रहा प्रकाश
कितनों को
दूसरों के लिए जलाता रहा
खुद को सहकर
आंधी तूफानों को
क्या इसका महत्व
कम हो पायेगा
ना जाने कितनी यादें अभी
इससे जुडी हैं
ना जाने कितनी हैं बाकी
दीया !
अनमोल पुरातन
जैसे मेरी बूढी दादी !!

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Comment

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Comment by Shashi Ranjan Mishra on October 14, 2010 at 5:26pm
सभी को बहुत बहुत धन्यवाद ... इस नाचीज कि हौसला आफजाई के लिए
Comment by Satyendra Kumar Upadhyay on October 14, 2010 at 3:51pm
खूबसूरत कविता
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on October 8, 2010 at 5:08pm
shashi bhaiya namaskaar...
yahan ye aapki pehli rachna hai aur pehli rachna hi ekdam dhamakedaar hai.....
मैं क्या
मुझसे भी पहले
औरों ने भी इसी दीये
के आँचल तले
आँखों को काले धुँए में
झोंकते हुए
पाया अपने लक्ष्य को,
bahut badhiya shashi bhaiya....aisehi likhte rahe...
Comment by Mumtaz Aziz Naza on October 8, 2010 at 3:57pm
kya baat hai, bhaavnaaon se otprot
Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on October 8, 2010 at 2:40pm
۞ शशि रंजन जी ۞ सुन्दर से एवं आसान शब्दों में बाँध लिया है आपने ... खूबसूरत कविता के लिए धन्यवाद ...... ۞
Comment by आशीष यादव on October 7, 2010 at 11:48pm
Kya shandar abhiwyakti hai. Purani yade kis tarah se yaad aa jati h. Aur budhi dadi, sach bahut achchha lga.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 7, 2010 at 7:58pm
मैं क्या
मुझसे भी पहले
औरों ने भी इसी दीये
के आँचल तले
आँखों को काले धुँए में
झोंकते हुए
पाया अपने लक्ष्य को,
बहुत खूब शशि भाई, लक्ष्य भेदने वाले किसी भी परिस्थितियों में लक्ष्य पा ही लेते है, और जीन मे लक्ष्य के प्रति दीवानगी नहीं है वो सारे सुख सुविधाओं के बीच भी भटक जाते है, दिया को प्रतिक बना आपने ओपन बुक्स ऑनलाइन के ओपन मंच पर काव्य सरिता बहा दिया है, बहुत ही सुंदर रचना और खुबसूरत अभिव्यक्ति, बधाई स्वीकार करे श्रीमान |

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