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कह मुकरने की कुछ कोशिशें...

(1)

वो डोले दुनिया मुसकाए।

पवन बसन्ती झूमे गाये।

बिन उसके जग खाली खाली,

क्या सखी साजन? ना हरियाली।

 

(2)

देख उसे तन मन हरियाये।

जी में ठंडक सी पड़ जाये।

उससे सब दिन मंगल मंगल,

क्या सखी साजन? ना सखी जंगल।

 

(3)

आँगन महका महका जाये।

मन को भी मेरे महकाये।

आँखों में बन खुशियाँ कौंधे,

क्या सखी साजन? ना सखी पौधे।

 

(4)

कभी नहीं उसको बिसराऊँ।

सभी जगह उसके गुण गाऊँ।

हर लेता वो मेरा मनवा,

क्या सखी साजन? ना सखी बिरवा।

 

(5)

दिखने में है बेहद सुंदर।

पुष्प भरा मनमोहक अंतर।

महके उससे सारी दुनिया,

क्या सखी साजन? ना सखी बगिया।

_____________________________

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Comment

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Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on August 2, 2012 at 6:57pm

आदरणीय अरुण निगम जी, आ अशोक जी आ अलबेला जी आ अरुण शर्मा जी... इस प्रयास को सराहने की लिए सादर आभार स्वीकारें...

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 1, 2012 at 12:10pm

संजय जी वाह क्या बात बेहद खुबसूरत, बधाई....

Comment by Albela Khatri on August 1, 2012 at 11:26am

आनंद आ गया  संजय जी...............वाह !
ज़बरदस्त कह-मुकरियां

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 1, 2012 at 8:18am

संजय जी      

            सादर,

            

दिखने में है बेहद सुंदर।

पुष्प भरा मनमोहक अंतर।

महके उससे सारी दुनिया,

क्या सखी साजन? ना सखी बगिया।

बहुत सुन्दर कह मुकरियाँ. बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on August 1, 2012 at 1:31am

उसकी  बातें  बड़ी निराली

शब्दों की बगिया का माली

काम करे वह होकर निर्भय

क्या सखी साजन ? ना सखी संजय ||

सुंदर , पर्यावरण पर कह मुकरी के लिये बधाई..................

कृपया ध्यान दे...

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