For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

छोड़ देना मत मुझे मेरे खुदा मझधार में.

सर झुकाए हूँ खडा मैं तेरे ही दरबार में.

राह में बिकते खड़े हैं मुल्क के सब रहनुमा,

रोज ही तो देखते हैं चित्र हम अखबार में.

देश की गलियाँ जनाना आबरू की कब्रगाह,

इक इशारा है बहुत क्या क्या कहें विस्तार में.

मौज में क्यूँ जी रहे हैं दुश्मने इंसानियत,

कौन दे इस प्रश्न का उत्तर भला संसार में.

अह्सने तक्वीम* के भी दाम लगते हैं यहाँ,

नामुनासिब कुछ नहीं है आज कारोबार में.

रात जैसे इक समंदर ख्वाब मेरे नाखुदा,

नाव मेरी कब रही है मेरे ही अधिकार में.

हर दफे मायूस करता आस्ताना यार का,

अब हबीब उम्मीद क्या है आस्ताना ए यार में.

__________________________________

* अह्सने तक्वीम = खुदा की सबसे कीमती रचना हमारा शरीर

___________________________________

Views: 487

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on August 2, 2012 at 6:58pm

सादर आभार डा बाली साहब....

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on July 31, 2012 at 9:24pm

संजय भाई बस इतना ही कहूँगा....बहुत उम्दा !!!

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on July 31, 2012 at 3:39pm

आदरणीय सतीश सर, आदरणीया राजेश कुमारी जी, आदरणीय संदीप भाई, आदरणीया रेखा जोशी जी, सादर आभार स्वीकारें...

Comment by Rekha Joshi on July 24, 2012 at 12:52pm

आदरणीय संजय जी 

राह में बिकते खड़े हैं मुल्क के सब रहनुमा,

रोज ही तो देखते हैं चित्र हम अखबार में..बेहद खूबसूरत गजल ,सभी शेर लाजवाब ,बधाई कबूल करें 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 24, 2012 at 10:23am

हिंदी और उर्दू दोनों को साध के लिखी अपने आप में उम्दा ग़ज़ल
सुन्दर शेर बने हैं
दाद क़ुबूल कीजिये सर जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 24, 2012 at 9:49am

अह्सने तक्वीम* के भी दाम लगते हैं यहाँ,

नामुनासिब कुछ नहीं है आज कारोबार में.

रात जैसे इक समंदर ख्वाब मेरे नाखुदा,

नाव मेरी कब रही है मेरे ही अधिकार में----------.    एक से बढ़कर एक शेर हैं ग़ज़ल में किन्तु ये दो शेर तो कमाल के हैं लाजबाब हैं बहुत बहुत बधाई संजय हबीब जी 

Comment by satish mapatpuri on July 24, 2012 at 1:05am

बहुत खूब हबीब साहेब ..... खुबसूरत ख्याल ... दाद कुबूल करें

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

दोहा पंचक. . . .संयोग शृंगारअभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही…See More
22 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service