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आल्हा - एक प्रयास

दुनिया यही सिखाती हरदम, सीख सके तो तू भी सीख।  

आदर्शों पर चलकर हासिल, कुछ ना होगा, मांगो भीख।

 

तीखे कर दांतों को अपने, मत रह सहमा औ मासूम।

जंगल का कानून यही है, गीदड़ बन जा पी खा झूम।

 

उनकी तो किस्मत है मरना, हिरण बिचारे सब अंजान।  

कदम कदम पे गहरे गड्ढे, गिर गिर गंवा रहे हैं जान।

 

शेर भेष धर गीदड़ घूमे, जंगल जंगल मचती खोज।

भोले खरगोशों की शामत, सिरा रहे वे बन कर भोज।  

 

हुई दुपहरी, अब तो जागो, कुंभकर्ण ना बन नादान।  

कौंवे शातिर सभी इधर के, ले कर उड़ जाएँगे कान।

 

कितने पूत शहीद हुये पर, मिली अजादी फूटे भाग।

वारिस ही अब भून चबाते, सपने स्वाद भरे हैं साग।

 

देश बना कर जलती भट्टी, सबने चढ़ा रखी है दाल।

हाड़ लहू के देगच में भी, अब तो आ ही जाय उबाल।

 

चीखेँ चलो चलें सब दमभर, ऐसा भीषण कर दें शोर।

छोड़ लंगोटी को भी अपने, भाग चलें सब हलकट चोर।

_____________________________________________

- संजय मिश्रा 'हबीब'

 

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Comment

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Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on July 23, 2012 at 7:32pm

हार्दिक आभार स्वीकारें आदरणीय सुरेन्द्र कुमार भ्रमर जी...

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 7, 2012 at 6:41pm

हुई दुपहरी, अब तो जागो, कुंभकर्ण ना बन नादान।  

कौंवे शातिर सभी इधर के, ले कर उड़ जाएँगे कान।

 प्रिय मिश्र हबीब जी ..बहतु आनंद आया ढोल की थाप और इस जोशीले आल्हा में ..गजब का व्यंग्य और सच ...काश भ्रष्टाचारियों के कान कौए ले जायं ..बधाई हो 

भ्रमर ५ 
भ्रमर का दर्द और दर्पण 

कितने पूत शहीद हुये पर, मिली अजादी फूटे भाग।

वारिस ही अब भून चबाते, सपने स्वाद भरे हैं साग।

 

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on June 1, 2012 at 6:48pm

आदरणीय सौरभ भईया, आपके शब्द सकारात्मक सृजन की प्रेरणा होते हैं.... अनगढ़ प्रयास पर आपकी सराहना पाकर अनुज प्रफुल्लित हो गया है... स्नेह और मार्गदर्शन  बनाए रखें गुरुवर.

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 31, 2012 at 10:03am

इस नगीने से मैं अबतक दूर रहा इसका खेद है. प्रवहमान पंक्तियों और सन्निहित भावों से यह आल्हा संग्रहणीय बन गया है. हालाँकि पारंपरिक आल्हा को यह उसतरह इंगित नहीं करता हैं जहाँ अतिशयोक्ति या अतिरेक को अतिविशिष्ट महत्ता मिली होती है. परन्तु, उन संदर्भों को भी प्रस्तुत छंद उदारता से छूता चलता है. यों, ये अलग बात है, कि जिसे अतिरेक के रूप में कहने की कोशिश हुई है वह संदर्भ आज की कटु सच्चाई बन कर विद्यमान है. जैसे, कौंवे शातिर सभी इधर के, ले कर उड़ जाएँगे कान  

इस बंद के लिये विशेष बधाई स्वीकार करें -

देश बना कर जलती भट्टी, सबने चढ़ा रखी है दाल।

हाड़ लहू के देगच में भी, अब तो आ ही जाय उबाल ॥

 

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on May 31, 2012 at 8:52am

आ भाई उमाशंकर मिश्र जी सादर आभार स्वीकारें.

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on May 31, 2012 at 8:51am

आ भाई आशीष जी... आभार स्वीकारें.

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on May 31, 2012 at 8:50am

आदरणीय भाई भ्रमर जी सादर स्वागत आपका....

प्रयास को सराहने हेतु सादर आभार स्वीकारें.  

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on May 31, 2012 at 8:48am

आदरणीय अविनाश भईया आपका अलग अंदाज उत्साहित करता है... ||सही गुस्सा...क्या हल?|| आल्हा के अंतिम पद में इसी हल की और संकेत करने का प्रयास किया है... 

सीखने.... हे भगवान!!! क्या कह दिया आपने...??

आप रायपुर जरुर पधारें.... आपकी संगत/आपका स्वागत करना मेरा सौभाज्ञ होगा... सादर। 

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on May 31, 2012 at 8:40am

आदरणीया राजेश कुमारी जी, प्रयास को सराहने के लिए सादर आभार.

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on May 31, 2012 at 8:39am

आपको यह प्रयास रुचा...सादर आभार भाई योगी सारस्वत जी 

हाँ आपके द्वारा लिखित 'गजल' शब्द पर थोड़ा अटक जरुर गया :))

कृपया ध्यान दे...

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