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आ प्रिये कि प्रेम का हो एक नया शृंगार अब....

आ प्रिये कि हो नयी
कुछ कल्पना - कुछ सर्जना,
आ प्रिये कि प्रेम का हो
एक नया शृंगार अब.....

तू रहे ना तू कि मैं ना
मैं रहूँ अब यूं अलग
हो विलय अब तन से तन का
मन से मन का - प्राणों का,
आ कि एक - एक स्वप्न मन का
हो सभी साकार अब....

अधर से अधरों का मिलना
साँसों से हो सांस का,
हो सभी दुखों का मिटना
और सभी अवसाद का,
आ करें हम ऊर्जा का
एक नया संचार अब.....

चल मिलें मिलकर छुएं
हम प्रेम का चरमोत्कर्ष,
चल करें अनुभव सभी
आनंद एवं सारे हर्ष,
आ चलें हम साथ मिलकर
प्रेम के उस पार अब....

ध्यान की ऐसी समाधि
आ लगायें साथ मिल,
प्रेम की इस साधना से
ईश्वर भी जाए हिल,
आ करें ऐसा अलौकिक
प्रेम का विस्तार अब....

- VISHAAL CHARCHCHIT

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Comment

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Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on September 2, 2012 at 10:05am

आप सभी मित्रों का ह्रदय से आभारी हूँ कि आपने इसे मान दिया.........!!!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 1, 2012 at 10:33pm

विदेह मन-हृदय के तारों को झंकृत करती इस रचना के लिये आपको हार्दिक बधाई, विशाल चर्चित भाई.  शब्द-शब्द प्रवहमान है. चिर युवा मनस-दशा के अद्भुत व मनोहारी क्षणों का समृद्ध वर्णन हुआ है.  आपकी संभवतः पहली रचना पढ़ रहा हूँ.  आपका हार्दिक स्वागत है.

शब्द सृजना है या सर्जना .. जरा देखियेगा.

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on August 31, 2012 at 6:20pm
आदरणीय चर्चित जी अच्छी रचना के बधाई।
Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on August 28, 2012 at 8:55pm

Yogi Saraswat एवं Naval Kishor जी आपका ह्रदय से आभारी हूँ !!!!

Comment by Yogi Saraswat on August 28, 2012 at 4:34pm

अधर से अधरों का मिलना
साँसों से हो सांस का,
हो सभी दुखों का मिटना
और सभी अवसाद का,
आ करें हम ऊर्जा का
एक नया संचार अब.....

क्या बात है विशाल जी , बहुत खूब ! बहुत सुन्दर शब्द और उतने ही सुन्दर भाव

Comment by Naval Kishor Soni on August 28, 2012 at 12:42pm

तू रहे ना तू कि मैं ना
मैं रहूँ अब यूं अलग
हो विलय अब तन से तन का
मन से मन का - प्राणों का,
आ कि एक - एक स्वप्न मन का
हो सभ साका अब....   bhut sunder

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