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बला का चेहरा तमाशा दिखाई देता है

बला का चेहरा तमाशा दिखाई देता है
हक़ीक़तों मैं जनाज़ा दिखाई देता है

चमक रहा था जो आकाश पर बना सूरज
ज़मीं पे आन के बोना दिखाई देता है

किसी चिता की यह जल कर बढ़ाएगा शोभा
वो एक दरखत जो सूखा दिखाई देता है

हमारी धरती पे नफ़रत के बीज बो के कोई
हवा के दोश पे उड़ता दिखाई देता है

हुआ ना आज भी सेराब बद दुआ लेकर
वतन से दूर जो भागा दिखाई देता है

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Comment

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Comment by SYED BASEERUL HASAN WAFA NAQVI on October 17, 2010 at 10:39am
kisi chita ki yeh jal kar badhaye ga shobha adil shb is kamsini main itne achche ashaar kahe hain mubarak bad hai aap ke liye.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 17, 2010 at 10:29am
वाह वाह आदिल साहिब बहुत ही अच्छी ग़ज़ल कही है आपने ,

चमक रहा था जो आकाश पर बना सूरज
ज़मीं पे आन के बोना दिखाई देता है,

इस शे'र के मिसरा सानी पर एक नजर फिर से डालना चाहेंगे | बाकी सब मुझे बहुत बढ़िया लगा, दाद कुबूल कीजिये |

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