For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

बारिश की धूप

सूरज कर्कश चीखे दम भर
दिन बरसाती
धूल दोपहर.. .।

उमस कोंसती
दोपहरी की
बेबस आँखों का भर आना
आलमिरे की 
हर चिट्ठी से
बेसुध हो कर फिर बतियाना.. .

राह देखती
क्यों ’उस’ की
ये
पगली साँकल
रह-रह हिल कर ।

चुप-चुप दिखती-सी
पलकों में
कबसे एक
पता बसता है
जाने क्यों
हर आनेवाला 
राह बताता-सा लगता है

पलकें राह लिये जीतीं हैं 
बढ़ जाता
हर कोई सुनकर ।

गुच्ची-गड्ढे
उथले रिश्ते
आपसदारी कीचड़-कीचड़
पेड़-पेड़ पर दीमक-बस्ती 
घाव हृदय के बेतुक बीहड़.. .

बोझिल क्षण ले
मन का बढ़ना
नम पगडंडी
सहम-बिदक कर ।

*******************
--सौरभ

Views: 986

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 21, 2012 at 11:20pm

मित्रवर गणेशलोहानीजी, आपको मैंने बहुत कम रचनाओं पर कुछ कहते सुना है. आपने मेरी रचना को यह सम्मान दे कर मुझे कृतज्ञ कर दिया है.  सहयोग के लिये सादर धन्यवाद.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 21, 2012 at 11:18pm

आदरणीय उमाशंकरजी, ऐसा नहीं लगता कि आपने इस रचना को कुछ विशेष ही मान नहीं दे दिया है ! अच्छी रचनाओं के अपने विशेष मानक हुआ करते हैं. बहरहाल सम्मान देने के लिये हृदय से शुक़्रगुज़ार हूँ.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 21, 2012 at 11:16pm

डॉ. प्राची, मैं इसी में खुश हूँ कि आपको यह रचना ठीक-ठीक लगी. विश्वास दिलाता हूँ, आगे और मेहनत करूँगा ताकि संप्रेषण प्रभावी हो.

हार्दिक धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 21, 2012 at 11:14pm

सीमाजी, आपकी सीधी बात दिल को छू गयी. यह अवश्य बताइयेगा कि यह रचना भावपूर्ण तो है, क्या अर्थवान भी है ?

सहयोग के लिये हार्दिक धन्यवाद.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 21, 2012 at 11:10pm

भाई गणेशजी, मेरी रचना पर आपकी प्रतिक्रिया इसे किसी लायक बना रही है. सहयोग के लिये हार्दिक धन्यवाद.

Comment by ganesh lohani on September 21, 2012 at 2:22pm

आदरनीय सौरभ पाण्डेय जी, सादर परनाम ,

बहुत सुन्दर रचना इस आधुनिकता की दौड़ में छटफटाहट महसूस हो रही  है दर्द भी उन दिनों को याद कर जब अपने सगा प्रेमियों की  चिठ्ठीयों को करीने से लगा कर रखते थे बीच बीच में उनको को उलट पलट कर पढना और डाकिये की राह तकते रहना | मोबाइल का दौर आया कुछ समय तक खूब बतियाते रहे | अब तो अपनों को भुला कुछ एक नए लोगोसे ही फुरसत नहीं है | 
   राह देखती 

क्यों ’उस’ की 
ये
 पगली साँकल 

रह-रह हिल कर |     यहाँ बड़ी सरल भाषा में "साँकल" दर्द और भी गहरा गया |
गुच्ची-गड्ढे 
उथले रिश्ते 
आपसदारी कीचड़-कीचड़ 
पेड़-पेड़ पर दीमक-बस्ती  
घाव हृदय के बेतुक बीहड़..   बहुत सुन्दर, इस सच्याई से मुहं नहीं मोड़ सकते|
बोझिल क्षण ले 
मन का बढ़ना 
नम पगडंडी 
सहम-बिदक कर ।  
अब तो पगडण्डी भी रूठ गयी हैं 
Comment by UMASHANKER MISHRA on September 21, 2012 at 12:21pm

आदरणीय सौरभ जी 

इतने सुन्दर ढंग से मौसम का  चित्रण 

इस मौसम में बेबसी,पीड़ा, प्रतीक्षा का अद्भुत चित्रण 

पूरा का पूरा दृश्य आँखों के सामने गुजर गया 

राह देखती 
क्यों ’उस’ की 
ये
 पगली साँकल 
रह-रह हिल कर ।.....उस की ....पगली साँकल...हिल कर ..वह अद्भुत कल्पना 

घाव हृदय के बेतुक बीहड़.. . आदरणीय शब्द कम होंगे बहुत लाजवाब है 

दिल को भेदती इस रचना के हर शब्द को नमन 

हार्दिक बधाई आदरणीय 

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 21, 2012 at 9:57am

आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी,

सुप्रभात.
बहुत सुन्दर गीत है यह...
पहली बार पढ़ा तो सिर्फ, आधा समझ में आया..कि किसी प्रिय की याद और इंतज़ार में लिखी गयी रचना है.
दूसरी बार पढ़ा तो रचना के शीर्षक 'बारिश की धूप' से मैं रचना का सामंजस्य नहीं बिठा पाई.
 
अब तीसरी बार आज सुबह यह रचना पढ़ी तो..  क्या ही अद्भुत चित्र  उभर कर आया है सामने,
 
गुच्ची-गड्ढे 
उथले रिश्ते 
आपसदारी कीचड़-कीचड़ 
पेड़-पेड़ पर दीमक-बस्ती  
घाव हृदय के बेतुक बीहड़.........क्या अनोखा बिम्ब दिया है आपने रिश्तों के उलझते सत्य और पीड़ा को.
 
बोझिल क्षण ले 
मन का बढ़ना 
नम पगडंडी 
सहम-बिदक कर । ...........बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.
 
इस नवगीत की हर पंक्ति में जिंदगी बसी है..... ह्रदय से बधाई स्वीकार करें इस अभिव्यक्ति के लिए.  सादर.
 
Comment by seema agrawal on September 20, 2012 at 11:03pm

कभी-कभी बातें सीधी-सीधी सुनने को मिले तो बहुत अच्छा लगता है. गीत का असर देर तक बना रहता है........कोई शक नहीं इस गीत का असर देर तक बना रहेगा :)
आलमिरे की  
हर चिट्ठी से 
बेसुध हो कर फिर बतियाना......क्या बात है !!!!इस प्रकार से शब्द प्रयोग आप ही कर सकते हैं 

चुप-चुप दिखती-सी
पलकों में 
कबसे एक 
पता बसता है 
जाने क्यों 
हर आनेवाला  
राह बताता-सा लगता है 
........बिलकुल मन के भावों को खंगाल कर शब्द दे दिये 

गुच्ची-गड्ढे 
उथले रिश्ते 
आपसदारी कीचड़-कीचड़ 
पेड़-पेड़ पर दीमक-बस्ती  
घाव हृदय के बेतुक बीहड़..........बारिश के मौसम का एक यह भी रंग है .... मिटटी में लिपटे सोंधे-सोंधे शब्द 
आप की  कलम की खासियत से लबरेज 
शब्दों की मिठास ने गीत में जान फूंक दी है 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 20, 2012 at 10:43pm

//राह देखती
क्यों ’उस’ की
ये
पगली साँकल
रह-रह हिल कर ।
//

आहा ! बहुत ही प्रवाहमयी रचना, आदरणीय सौरभ भईया, आपकी रचना बिलकुल सरल रेखा में बहती नजर आती है, शब्दों का ऐसा संयोजन वाह वाह, ह्रदय बरबस ही आकर्षित हो जाता है, सांकल का प्रयोग बहुत ही रुचा, इस नवगीत पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

जगदानन्द झा 'मनु' replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय, प्रणाम संगहि संग हार्दिक धन्यवाद। अपनेक मार्गदर्शन पाबि बहुत बेसी मोटिवेशन आ सीखक मिलैए…"
5 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15
जगदानन्द झा 'मनु' added 2 discussions to the group मैथिली साहित्य
Aug 10
Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Aug 6

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Aug 3
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service