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एक नवगीत : शब्द चित्रों की सफलता के लिए

खूबसूरत दृश्य
हम गढ़ते रहे,
शब्द चित्रों की
सफलता के लिए |


शहर धीरे धीरे
बन बैठा महीन
दिख रहा है हर कोई
कितना जहीन
गाँव दण्डित है
सहजता के लिए || १ ||

घर की दीवारों
में हाहाकार है
लक्ष्मी का रूप
अस्वीकार है
कौन सोचे
नव प्रसूता के लिए || २ ||

जब से हम सब
खुद पे अर्पण हो गये
बस तभी शीशा से
दर्पण हो गये
या सुपारी हैं
सरौता के लिए || ३ ||

हाशियों में भी
नहीं संवेदना
हर नए पन्ने में
खुद की कल्पना
हैं सभी आतुर
नवलता के लिए || ४ ||

अनकही ग़ज़लें भी
चोरी हो गईं
पंक्तियाँ भावों से
कोरी हो गईं
हम तखल्लुस भर हैं
मक्ता के लिए || ५ ||

मित्रों
गीत विधा में हाथ आजमा रहा हूँ, कहीं कुछ चूक हुई हो तो अवश्य बताएँ, आभारी रहूँगा
सादर

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Comment

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Comment by वीनस केसरी on October 14, 2012 at 7:32pm

आदरणीय गणेश जी,
ह्रदय तल से आपको बारम्बार धन्यवाद

Comment by वीनस केसरी on October 14, 2012 at 7:30pm

धन्यवाद लक्षमण प्रसाद जी
आपकी सदाशयता को बारम्बार प्रणाम

Comment by वीनस केसरी on October 14, 2012 at 7:27pm

सौरभ जी सादर धन्यवाद
गीत का द्वितीय प्रयास आपसे अनुमोदित हुआ यह मेरे लिए हर्ष का विषय है

नवालता को नवलता पढ़ें (टंकण त्रुटि है )


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 14, 2012 at 12:12pm

//हम तखल्लुस भर हैं
मक्ता के लिए//

आहा !! क्या बात कही है वीनस भाई, स्वयम के अस्तित्व को सिमित करती पक्तियां बहुत कुछ अनकहे कह जाती हैं, बहुत ही सुन्दर नव गीत, बहुत बहुत बधाई |

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 14, 2012 at 9:57am
खुबसूरत नवगीत हार्दिक बधाई श्री वीनस केसरी जी -

जब से हम सब 
खुद पे अर्पण हो गये 
बस तभी शीशा से 
दर्पण हो गये ------------बेहतरीन पंक्तिया उम्दा अभिव्यक्ति भाई वीनस जी 

या सुपारी हैं 
सरौता के लिए

अनकही ग़ज़लें भी 
चोरी हो गईं -------------हे राम क्या जमाना आ गया | ऍफ़ आई आर दर्ज कराई क्या ?
पंक्तियाँ भावों से 
कोरी हो गईं ------------ भावुक अब भूखे मरते है, पंक्तियों में भाव नहीं खुनी मांग भरते है, सर जी 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 14, 2012 at 7:06am

वीनस भाई, सर्वप्रथम तो आपको इस सद्-प्रयास पर हार्दिक बधाई.

इस नवगीत के कई बिम्ब बरबस ध्यान खींचते हैं.

शहर धीरे धीरे
बन बैठा महीन
दिख रहा है हर कोई
कितना जहीन
गाँव दण्डित है
सहजता के लिए

वाह ! आखिरी पंक्तियों पर रोमांच हो आया. सबसे अव्वल, शहर के लिये महीनी शब्द दिल को भा गया.

बहुत-बहुत बधाई, इस गठन पर !

हाशियों में भी
नहीं संवेदना
हर नए पन्ने में
खुद की कल्पना
हैं सभी आतुर
नवालता के लिए

वाह ! क्या सटीक संप्रेषण है ! दिल से बधाई इस बंद पर.

एक बात,  शब्द ’नवालता’ है या ’नवलता’ ?

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