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पल पल अपना रूप बदलता ,,,निशा निमंत्रण की खातिर ही

लाल गेंद बन उछल गया है ,
बाल सुलभ ज्यों किलक रहा है
कुछ पल ही में रूप बदलकर
अब यौवन में सिमट गया है

स्वर्ण सी आभा फ़ैल रही है
मिटटी स्वर्ण में परिणित होगी
रेनू जाल के सिरे पकड़ कर
दुर्बल काया भी चल देगी

संध्या की चादर हलकी है
मछुवारे के जाल के जैसी
खींच रही पल पल वो उसको
छिपना होगा निशा से पहले

जीवन के पल पल अंतर से
कुछ तो रूप येही लगता है
बाल सुलभ सूरज को तकना
आँख बंद तो चन्दा अपना,

 

निशा निमंत्रण देने आयी
स्वप्न में कितने तोहफे लाई
पथिक रहा तू कुछ पल तक
अब विश्राम की बेला आयी,

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on December 17, 2012 at 9:32am

क्षमा करें प्रतिक्रया में  गलती से strikethrough कि टेब दबी रह गयी है कृपया इसे हटाकर पढ़ें.  

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 17, 2012 at 9:30am

सुन्दर भाव प्रस्तुत करती रचना के लिए बधाई स्वीकारें आद. सुमन मिश्राजी.

कृपया ध्यान दे...

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