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प्रतिबिम्बों में जी लूं पहले ....

प्रतिबिम्बों में जी लूं पहले ....

By Suman Mishra on Tuesday, 27 November 2012 at 13:25 ·

एक सत्य जो सबको दिखता,

एक सत्य प्रतिबिंबित सा है

वेगवान है जीवन पल पल

रुक थोड़ा तू दिग्भ्रमित क्यों है

जी लूं कुछ पल खुद को खुद में

कह लूं सुन लूं खुद से खुद मैं

एक बार मैं हंस लूं खुद पे

फिर पट बंद हों मन दर्पण के

क्या ये वही जो मैंने देखा

मन वत्सल पर रूप की रेखा

कुछ तो अलग ये होगा मुझसे

मैं या ये प्रतिबिबित चेहरा

जल की सतह शांत पर छिछली

दस्तक दी तो गति पा मचली

आत्मसात दर्पण सा मुझको

क्या है पूछे जैसे सहेली

जीवन जब तक छाया तब तक

परछाई + प्रतिबिम्ब समर्थक

रंग और बे-रंगी सा बाना ,

मन स्थिर , अस्थिर शब् तक

दर्शन क्या है बड़ा जटिल है

एक तिलस्म का जाल बिछा है

सोकर जागा, जाके सोया

मन मंथन हर पल भरमा है

सच को खोजा हर पल छिन में

स्वर्ण में हो या हो तिनकों में

मिला अगर वो बन बैरागी

महल छोड़,,चल मन जंगल में

मैं प्रतिबिम्बों की साक्षी हूँ

सूर्य दूर पर उसकी प्राची

कर उसका स्पर्श जो बिखरूं

पारदर्श मन जीवन जी लूं,

Views: 496

Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 10, 2012 at 12:40pm

सुन्दर कविता -

जी लूं कुछ पल खुद को खुद में

कह लूं सुन लूं खुद से खुद मैं

एक बार मैं हंस लूं खुद पे

फिर पट बंद हों मन दर्पण के

क्या ये वही जो मैंने देखा - बहुत खूब बधाई स्वीकारे 

Comment by SUMAN MISHRA on December 9, 2012 at 1:44pm

आदरणीय स्नेही जन,,,आभार आप सभी का,,,,

Comment by vijay nikore on December 9, 2012 at 11:54am

आदरणीया सुमन जी,

जी लूं कुछ पल खुद को खुद में

कह लूं सुन लूं खुद से खुद मैं

एक बार मैं हंस लूं खुद पे

फिर पट बंद हों मन दर्पण के

अति सुन्दर अभिव्यक्ति।

बधाई।

विजय निकोर

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 9, 2012 at 11:31am

आदरणीया सुमन जी बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई स्वीकारें


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 9, 2012 at 9:12am

स्वयम से बाते करती रचना अच्छी बन पड़ी है , कुछ पक्तियां अत्यंत ही खुबसूरत रची है ,

मन वत्सल पर रूप की रेखा

कुछ तो अलग ये होगा मुझसे...

वाह, बहुत सुन्दर, इस शानदार अभिव्यक्ति पर बधाई स्वीकार करें आदरणीया सुमन जी |

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