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उफ्फ..! ये सभ्य समाज के लोग..

उफ्फ..! ये सभ्य समाज के लोग..
कहते हैं इंसान स्वयं को
पर इंसानियत को समझ ना पाएँ I

जिस माँ ने पाल-पोसकर
इनको इतना बड़ा बनाया
बाँधकर उनको जंज़ीरों में
जाने कितने बरस बिताएँ I
उफ्फ..! ये सभ्य समाज के लोग..

तेईस बेंचों की कक्षा इनको
भीड़ भरा इक कमरा लगती
पर डिस्को जाकर
हज़ारों की भीड़ में
अपना जश्न खूब मनाएँ I
उफ्फ..! ये सभ्य समाज के लोग..

कॉलेज में नेता के आगे
बाल मज़दूरी पर
वाद विवाद कराएँ
और फिर नुक्कड़ पर जाकर ये
बड़ी ज़ोर से आवाज़ लगाएँ,
छोटू ! दो चाय लाना यार ..
उफ्फ..! ये सभ्य समाज के लोग..

Facebook पर अजनाबीयों संग
घंटों घंटों ये बिताएँ
पर देख पड़ोसी को मुस्कुराता
नज़रें चुराकर निकल ये जाएँ I
उफ्फ..! ये सभ्य समाज के लोग..

दूर देशों से घूमके आकर
साफ सफाई की बात बताएँ
और बातों ही बातों में ये
सड़क पर बबलगम थूक जाएँ I
उफ्फ..! ये सभ्य समाज के लोग..

है 15 अगस्त रविवार को
दो महीने से इस पर हल्ला मचाएँ
ना होती खुशी स्वतंत्रता दिवस की
एक छुट्टी जाने का शोक मनाएँ I
उफ्फ..! ये सभ्य समाज के लोग..

खाते हैं केवल दो रोटी
शुद्ध बनी सफेद आटे की
पर चुपके चुपके चाँद पर जाकर
अपनी काली कमाई छिपाएँ I
उफ्फ..! ये सभ्य समाज के लोग..

उफ्फ..! ये सभ्य समाज के लोग..
कहते हैं इंसान स्वयं को
पर इंसानियत को समझ ना पाएँ I

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Comment by Veerendra Jain on October 31, 2010 at 11:17pm
Ganesh ji बहुत बहुत धन्यवाद ...
Comment by Veerendra Jain on October 31, 2010 at 11:15pm
Navin ji बहुत बहुत आभार...

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 31, 2010 at 10:21am
वीरेन्द्र जी, बहुत ही झन्नाटेदार तमाचा लगाया है इन कथित सभ्य समाज के गाल पर, बेपर्दा कर दिया है आपने, बहुत ही उम्द्दा ख्याल है भाई, बधाई हो इस बेहतरीन रचना पर |

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"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
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