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आज सुबह
जब घड़ी की सुइयाँ
हो तैयार
निकल पड़ीं विपरीत दिशाओं को
तभी
हुई दरवाज़े पर दस्तक
बंद आँखों से ही
नींद ने हिलाया मुझे
और ना चाहते हुए भी
आधी सोई आधी जागी आँखों से
दरवाज़ा खोला मैने
फटे होंठों से मुस्कुराते हुए
खड़ी थी ठिठुरती ठंडI

चाय की प्याली की गरमाहट
महसूस करते हुए
दोनों हथेलियों पर
खिड़की से बाहर झाँका मैने
तो आज सूरज ने भी
नहीं लगाई थी
दफ़्तर में हाज़िरी
बादलों की रज़ाई में
मुँह छिपाए
सोया है अब तक शायद
और इसलिए
आज देर से आए
या छुट्टी ही ले ले शायद I
चाँद के कदमों की आहटें भी
जल्द ही हो गई थी बंद
छोड़ आया था शायद
वो कश्मीरी शॉल घर पर ही
और इसलिए
भोर से बहुत पहले ही
उबासी लेते हुए
कम्कपाते पैरों से
लौट गया हो घर को I

ठंड का असर तो
दिखता है सबसे ज़्यादा
इन ग़रीब तारों पर
जो कम्पकपाते हुए
गुजारते हैं सारी रात
महज़ इस लटके हुए
आकाश के तंबू के नीचे I
ना जाने कब आएगी
वो सरकार
ना जाने कौन सी होगी
वो सत्ता मेरे यार
जो देगी इन्हें
एक छत और दीवारें चार
इसी उधेरबुन में
निकल गया काफ़ी वक़्त
आज फिर ठंडी चाय ही गीटकनी पड़ेगी II

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Comment

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Comment by Veerendra Jain on October 25, 2010 at 11:19pm
dhanyawad Ganesh ji...aapka protsahan agli rachana ke liye bahut sahaayta karta hai...
Comment by Veerendra Jain on October 25, 2010 at 11:16pm
bahut bahut aabhar tiwariji...
Comment by Veerendra Jain on October 25, 2010 at 11:15pm
Navin ji बहुत बहुत धन्यवाद...आपको रचना पसंद आई तो मेरा लिखना सार्थक हुआ साथ ही आशा करता हूँ कि आप आयेज भी मेरा मार्गदर्शन करते रहेंगे I
ये ग़रीब तारे शब्द का प्रयोग मैने उन ग़रीब तबके के लोगों के सन्दर्भ मे करने की कोशिश की है...जो खुले आसमान के नीचे सड़क पर रात गुज़ारते हैं I
दरअसल मैं जब भी उन्हे देखता हूँ तो एक टीस सी उठती है मन में, इसलिए मैने वो सरकार वाली पंक्तियाँ कही I
Comment by Veerendra Jain on October 25, 2010 at 11:00pm
dhanyawad Preetamji.... aapne rachanaa padhi aur sarahi....bahut bahut aabhar...

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 25, 2010 at 9:36pm
ठंड का असर तो
दिखता है सबसे ज़्यादा
इन ग़रीब तारों पर
जो कम्पकपाते हुए
गुजारते हैं सारी रात
महज़ इस लटके हुए
आकाश के तंबू के नीचे I
ह्रदय को छू लेने वाली पक्तियां , वाकई बेहतरीन है, बेहतरीन अभिव्यक्ति वीरेंद्र साहब ,
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on October 25, 2010 at 11:32am
खुबसूरत रचना वीरेंद्र साहब...बहुत ही शानदार लिख रहे हैं आप...ऐसेही लिखते रहे....अगली रचना का इंतज़ार रहेगा...

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