For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ढलती हुई शाम ने
अपना सिंदूरी रंग
सारे आकाश में फैला दिया है,
और सूरज आहिस्ता -आहिस्ता
एक-एक सीढ़ी उतरता हुआ
झील के दर्पण में
खुद को निहारता
हो रहा हो जैसे तैयार
जाने को किसी दूर देश
एक लंबे सफ़र पर I

काली नागिन सी,
बल खाती सड़कों पर
अधलेते पेड़ों के सायों के बीच
मैं,
अकेला,
तन्हा,
चला जा रहा हूँ
करता एक सफ़र,
इस उम्मीद पर
कि अगले किसी मोड़ पर
राहों पर अपनी धड़कनें बिछाए
तुम करती होगी मेरा इंतेज़ार I

और इसलिए
हर मोड़ पर
झाँक लेता हूँ चुपचाप
कि किसी ने पुकारा तो नही मेरा नाम
इस अनजान डगर पर
इस अनजान सफ़र पर I

ना जाने कब
ख़त्म होगा
ये इंतज़ार,
ना जाने कब
ख़त्म होगा
ये सफ़र,
मेरा,
तुम्हारा,
हम दोनों का I

है मेरे मन को ये विश्वास
कि जल्द होने को है समाप्त
तुम्हारा suffer और मेरा सफ़र I

और फिर,
पकड़े एक-दूसरे का हाथ
थामे धड़कनों का साथ
जीवन की उबड़-खाबड़ राहों पर
बन एक-दूसरे का सहारा
करेंगे हम एक स्वर्णिम सफ़र,
जीवन के अंतिम पड़ाव तक
और फिर चल पड़ेंगे हम भी
सूरज की तरह,
किसी और जहाँ की ओर
एक लंबे सफ़र पर II

Views: 459

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Veerendra Jain on October 25, 2010 at 11:22pm
dhanyawad preetamji...
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on October 25, 2010 at 12:04pm
ना जाने कब ख़त्म होगा ये इंतज़ार,
ना जाने कब ख़त्म होगा ये सफ़र मेरा,
तुम्हारा,हम दोनों का इ

बहुत ही बढ़िया लिखा है आपने वीरेंदर साहब.....बहुत खूब,,,,ऐसेही लिखते रहे...अगली रचना का इंतज़ार रहेगा....
Comment by Veerendra Jain on October 23, 2010 at 12:01am
bahut bahut dhanyawad...Singh sahab....

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on October 22, 2010 at 7:44pm
बहुत सुन्दर भावनाएं और सुन्दर चित्रण
प्रेयसी का साथ और जीवन का लम्बा सफ़र.......... यक़ीनन आसान हो जाता है
Comment by Veerendra Jain on October 21, 2010 at 11:46pm
Navinji... bahut bahut dhanyawad...aapne meri rachna padhi aur usse saraha, iske liye bahut bahut aabhar..
Comment by Veerendra Jain on October 21, 2010 at 11:44pm
Ganesh ji bahut bahut aabhar.... aapke comments bahut hi protsahit karte hain...dhanyawad

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 21, 2010 at 10:03am
और फिर,
पकड़े एक-दूसरे का हाथ
थामे धड़कनों का साथ
जीवन की उबड़-खाबड़ राहों पर
बन एक-दूसरे का सहारा
करेंगे हम एक स्वर्णिम सफ़र,
जीवन के अंतिम पड़ाव तक,

आमीन ! ऐसा ही हो !
वीरेन्द्र साहिब बहुत बढ़िया, सुंदर ख्यालात, प्रकृति के साये मे घुमती हुई यह रचना वास्तव मे बहुत ही बेहतरीन बनी है , बधाई कुबूल कीजिये |
Comment by Veerendra Jain on October 20, 2010 at 11:14pm
Julie ji बहुत बहुत धन्यवाद...उम्मीद करता हूँ की आप इसी तरह मेरे प्रयासों की सराहना करती रहेंगी, साथ ही मेरी ग़लतियाँ भी बताती रहेंगी... शुक्रिया
Comment by Julie on October 20, 2010 at 9:50pm
और सूरज आहिस्ता -आहिस्ता
एक-एक सीढ़ी उतरता हुआ
झील के दर्पण में
खुद को निहारता

वाह... बहुत बहुत सुंदर कल्पना... और सफ़र के शुरू होने से पहले अंदर का डर... बहुत ही बेहतरीन अंदाज़ में शब्दों में पिरोया है आपनें वीरेंद्र जी... बधाई... सुंदर रचना के लिए...!!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
36 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
5 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"पत्थर पर उगती दूब ============ब्रह्मदत्तजी स्नान-ध्यान-पूजा आदि से निवृत हो कर अभी मुख्य कमरे में…"
Friday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
Thursday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीया रिचा यादव जी नमस्कार बहुत शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई का "
Thursday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service