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हरसिंगार की खुशबू हो तुम

मेरे मन के दरख्त की डाली
झुकी झुकी सी, फूलों सी है
लरज लरज कर बाहों जैसी
याद तुम्हारी कर लेते हैं .

अब यादों की बदली से हम
भीग भीग कर सूख रहे हैं,
एक तुम्हारी चाहत ही है
जिसे अभी तक सींच रहे है

एक अंजुरी नयन नीर से,
एक एक पल जैसे हो पीर से
हर पल हरसिंगार की खुशबू
एक दिलासा मन के तीर (किनारा) से

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Comment by SUMAN MISHRA on December 17, 2012 at 1:06pm

shukriya rajesh di


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 17, 2012 at 10:08am

अब यादों की बदली से हम 
भीग भीग कर सूख रहे हैं, 
एक तुम्हारी चाहत ही है 
जिसे अभी तक सींच रहे है---प्यारी पंक्तियाँ 

Comment by SUMAN MISHRA on December 17, 2012 at 12:39am

sri shaindra ji shukriya aapka

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on December 16, 2012 at 9:54pm

अब यादों की बदली से हम
भीग भीग कर सूख रहे हैं, लाजवाब पंक्ति, बहुत ही सुंदर रचना हार्दिक बधाई स्वीकार करें

Comment by SUMAN MISHRA on December 16, 2012 at 1:44pm

अन्जुश्री दी ,,आभार आपका

Comment by SUMAN MISHRA on December 16, 2012 at 1:44pm

अरुण जी....बहुत बहुत शुक्रिया आपका...

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 16, 2012 at 1:21pm

आदरणीया सुमन जी मुझे रचना बेहद पसंद आई, बधाई स्वीकारें.

अब यादों की बदली से हम
भीग भीग कर सूख रहे हैं, लाजवाब पंक्ति.....
एक तुम्हारी चाहत ही है
जिसे अभी तक सींच रहे है   वाह क्या बात है ...   

Comment by Anwesha Anjushree on December 16, 2012 at 12:09pm

साधना है, राह सरल नहीं, पथिक बने रहो।सुंदर 

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