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 गणतंत्र की जय !

गणराज्य की जय !

गणतन्त्र की सरहदें,

, गणराज्य की सरहदें,

जो तय की थी हमने,

वो टूट क्यों जाती हैं,

प्रजा के जुटने पर ?

प्रजातंत्र / लोकतंत्र /गणतन्त्र !

प्रजा से डरता क्यों है ?

उसे तो हमने ही बुना था,

अपने लिए !

आज वो खोखला हो गया है !

या खोखला कर दिया गया है !!

वो अपनी ही शक्ति से,

गण से प्रजा से,

कतराता क्यों है ?

शायद गणतंत्र के रखवालों ने,

बदल दी अट्टालिकाएं,

प्रजातंत्र की / लोकतंत्र की /गणतन्त्र की !

तभी तो गणराज्य दूर हो गया है,

गण से प्रजा से !

फिर भी गणतंत्र की जय !

गणराज्य की जय !

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on February 3, 2013 at 10:55pm

आदरणीय राजेश भारद्वाज जी सादर, सच है आज जनतन्त्र जन से ही दूर है, सुन्दर रचना बधाई स्वीकारें.

गण का तन्त्र गण से आज दूर हो गया.

जीता गाडी में बैठा नशे में चूर हो गया,

हम बैठे बाट जोहते रहे उसकी हर बरस,

आया जरुर,वोट लिया और फुर्र हो गया/

Comment by RAJESH BHARDWAJ on February 3, 2013 at 8:22pm

तहे दिल से शुक्रिया  !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on February 3, 2013 at 11:52am

मन की अनुभूतियों को व्यक्त करती हुई सुंदर रचना....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 3, 2013 at 6:54am

सही कहा है आपने, प्रजातंत्र अपनी प्रजा से आज दूर दीखता है. बेहतर प्रयास किया है आपने, राजेश जी. 

शुभेच्छाएँ

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