For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

कंह गोरी पनघट कहाँ,कंह पीपल की छांव।
पगडंडी दिखती नहीं,बदल रहा है गांव॥
बदल रहा है गाँव,खत्म है भाईचारा।
कुछ परिवर्तन ठीक,किन्तु कुछ नहीं गवारा॥
ग्लोबल होते गाँव,गाँव की मार्डन छोरी।
कहें विनय नादान,कहाँ पनघट कंह गोरी॥

पगडंडी ये गाँव की,सड़क बनी बेजोड़।
जो जाती है शहर को,जन्म-भूमि को छोड़॥
जन्म-भूमि को छोड़,कमाने रोजी जाते।
करते दिनभर काम,रात फुटपाथ बिताते॥
भर विकास का दम्भ,शहर कितना पाखंडी।
हमको आये याद,गाँव की वो पगडंडी॥

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 899

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 25, 2013 at 1:27pm
आदरणीया प्राची दीदी जी!छंद की सराहना के लिये हार्दिक आभार।
निश्चय ही संशय का विषय है।मेरे भावानुसार यहां बीच में एक पंक्ति छिपी हुई है।और गांव की पगडंडी जो सड़क बन गयी है,वह शहर की तरफ जाती है,यद्यपि पगडंडी का जन्म या यूं कहें मूल गांवों में ही निहित है तथापि अब वह शहर की सड़कों के सदृश है अत: उस पर अब गांव के मानिंद कार्य नहीं होते शहर के मानिंद होते हैं।लक्ष्यार्थ यह है कि गांव में पैदा होने वाले बच्चे बड़े होने पर जन्मभूमि के मोह को छोड़कर शहर का रुख करते हैं।जिसे सड़कों के माध्यम से व्यक्त किया गया है।सम्भत: कथ्य और भाव के मध्य उचित संयोजन नहीं बन पाया है।सुधार का प्रयास करता हूं।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 25, 2013 at 12:36pm

प्रिय विन्ध्येश्वरी जी,

बहुत सुन्दर भाव दोनों कुण्डलिया छंदों के,

गाँव के होते जाते शहरीकरण में बहुत कुछ बदला है, जिसे पीड़ा आप सहजता से संप्रेषित कर पा रहे हैं, 

बहुत बहुत बधाई..

एक बात आपकी दूसरी कुण्डलिया को पढ कर मन में आयी है...

जैसा हम जानते हैं की कुण्डलिया दोहा और रोला के संयोजन से बनती है, तो क्या दोहा का भी पूर्ण अर्थ निकलना ज़रूरी नहीं है..?

पगडंडी ये गांव की,सड़क बनी बेजोड़।
जो जाता है शहर को,जन्म-भूमि को छोड़॥

इसमें पहली और दूसरी पंक्ति का आपस में सामंजस्य मैं नहीं बैठा पा रही हूँ..

आप गौर करके कुछ सांझा करे ताकि मेरा संशय दूर हो सके.

सादर.

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 25, 2013 at 7:09am
गुरुदेव सादर नमन!
रचना पर आपका बहुमूल्य समय पाकर मैं कृतकृत्य हूं,रचना भी गौरवान्वित हुई है।जिस त्रुटि को आपने रेखांकित किया है,वह मेरी मजबूरी बस हुई है।मैं नेट का मोबाइल उपभोक्ता हूं।जिसमें ''ॉ'' लगाने की सुविधा है पर चंद्र बिन्दु नहीं।रचनाकर्म का दोषी होने के कारण क्षमाप्रार्थीं हूं।
सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 24, 2013 at 8:23pm

गाँव और वहाँ की वर्तमान दशा को केन्द्र में रख कर अच्छी कुण्डलिया प्रस्तुत हुई हैं, विंध्येश्वरी भाई. दोनों कुण्डलिया के कथ्य भाव के अनुसार यथोचित रूप से संप्रेषित हो रहे हैं. इस हेतु हार्दिक बधाई. 

 

 

एक बात :  अनुस्वार और चन्द्र-विन्दु में मात्रा और स्वर के लिहाज से बहुत अंतर है. तदनुरूप शब्दों में अंतर भी होते हैं. यह अवश्य है इस ओर आपकी दृष्टि आवश्यक है. आपने अपनी प्रस्तुति में चन्द्र विन्दु के स्थान पर अनुस्वार का बड़ी उदारता से प्रयोग किया है जो कतिपय शब्दों के अर्थों के अनर्थ तो कर ही रहा है, पाठकों को भी भ्रम में डाल रहा है. वे शब्द है -- कहँ तथा गाँव.   कहना न होगा कि कहँ शब्द कहाँ का आंचलिक रूप है.

शुभ-शुभ

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 24, 2013 at 7:13pm
आदरणीय बागी सर जी!रचना पर समय देने के लिये आपका आभारी हूं।
सर "कहं" शब्द का प्रयोग कहां अर्थ में किया गया है।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 24, 2013 at 7:11pm
जय श्रीराम!आपको नमन!व आभार

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 24, 2013 at 4:01pm

विन्धेश्वरी भाई कुण्डलिया दोनों अच्छी लगी,"कहं" का प्रयोग समझ नहीं सका, जरा प्रकाश डालना चाहेंगे । 

Comment by श्रीराम on February 24, 2013 at 1:08pm

बहुत ही सुन्दर 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri posted a blog post

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है…See More
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
Wednesday
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Feb 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Feb 28

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Feb 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Feb 28

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Feb 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Feb 28

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service