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कल तो हरदम कल रहता है।
कल को मनुज विकल रहता है॥

कल को किसने कब देखा है।
यह आशाओं की रेखा है॥
हमें सदा बस यह खलता है।
कभी नहीं यह कल रुकता है॥

सबकी इच्छा कल अच्छा हो।
कल से पूर्व कलन अच्छा हो॥
मित्र!आज से कल बनता है।
कल की चिंता क्यों करता है॥

कल-बल से कल पकड़ न आया।
बहुत जनों ने जोर लगाया॥
कल तो काल सदृश लगता है।
बड़े-बड़ों को कल छलता है॥

कल बहुतों का कल ले लेता।
कल को छीन विकल कर देता॥
कल सुधरेगा दिल कहता है।
नहीं आज तो कल लगता है॥

कल को कलम बदल देगी अब।
कल कर आज दिखा देगी अब॥
कलमकार वह कर सकता है।
जो करने से कल डरता है॥

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Comment by Saurabh Pandey on March 7, 2013 at 2:47pm

भाई विंध्येश्वरी जी, चौपाई छंद पर आपका प्रयास बहुत ही आश्वस्तकारी है. आपने कल के यमक स्वरूप में बहुत कुछ साझा किया है. समय, उपकरण, संतोष या चैन, चतुरायी क्या कुछ नहीं बाँध लिया है आपने इस कल में ! वाह-वाह !

Comment by ram shiromani pathak on March 5, 2013 at 10:16pm

कल को कलम बदल देगी अब।
कल कर आज दिखा देगी अब॥
कलमकार वह कर सकता है।
जो करने से कल डरता है॥

बहोत ही बढ़िया कहा आपने आदरणीय  विनय जी ........ बहोत खूब 

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