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रचें छंद में काव्य

छंदों में ही बात हो,छंदों में लें सांस।
छंद बद्ध कविता रचें,नित्य करें अभ्यास॥
नित्य करें अभ्यास,शिल्प तब सधता जाये।
लेकिन भाव प्रधान,नहीं इसको बिसरायें॥
अंलकार,रस,छंद,और गुण हो शब्दों में।
वेद मंत्र की शक्ति,निहित तब हो छंदो में॥

कविता को मत ढूढ़िये

कविता तो मिल जायगी,यदि हो कवि की दृष्टि।
जिसका जितना पात्र हो,भर पाता जल वृष्टि॥
भर पाता जलवृष्टि,ठीक कविता ऐसी है।
मन में उठी तरंग,और सरिता जैसी है॥
कहे विनय नादान,सिन्धु से मिलती सरिता।
भाव सिन्धु में डूब,तभी मिलती है कविता॥

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 16, 2013 at 6:38pm

जी गुरुदेव! आपका मंतव्य समझ गया..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 15, 2013 at 10:37pm

अच्छी कुण्डलिया हुई हैं, भाई विंध्यश्वरीजी. 

नित्य करें अभ्यास,शिल्प तब सधता जाये।
लेकिन भाव प्रधान,नहीं इसको बिसरायें॥
अंलकार,रस,छंद,और गुण हो शब्दों में।
वेद मंत्र की शक्ति,निहित तब हो छंदो में॥...   वाह-वाह !

आपकी कहे पर मैं स्वयं को कहने से रोक नहीं पा रहा हूँ -

सोच को शब्द और तेवर दे

फिर जुबां को समय व अवसर दे.. .

चुप रहे तो विचार कुढ़ते हैं

शब्द के भाव को रच महावर दे ..

बहुत बहुत बधाई

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 15, 2013 at 4:38pm
भाई रामशिरमणि जी! कुंडलिया सराहना के लिये आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 15, 2013 at 4:36pm
आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी! रचना सराहना के लिये हार्दिक आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 15, 2013 at 4:35pm
केवल प्रसाद जी रचना सराहना के लिये आभार!
Comment by ram shiromani pathak on March 12, 2013 at 6:02pm

 सुन्दर सीख देती कुंडलिया छंद और कविता के लिए बधाई श्री विन्ध्येस्वरी प्रसाद त्रिपाठी जी ...........

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 12, 2013 at 3:51pm

छंद बद्ध कविता रचें,नित्य करें अभ्यास॥ - बिलकुल सही कहा आपने निरंतर अभ्यास से ही रस माय छंद में काव्य रचा जा सकता 

है | सुन्दर सीख देती कुंडलिया छंद और कविता के लिए बधाई श्री विन्ध्येस्वरी प्रसाद त्रिपाठी जी 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 12, 2013 at 6:29am

विन्ध्येश्वरी त्रिपाठी विनय जी !  सादर प्रणाम! !  रस-छंद भरा सस्नेह कलश अच्छा लगा बधाई हो!

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