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मैं तक़रीबन बीस साल बाद विदेश से अपने शहर लौटा था। बाज़ार में घूमते हुए सहसा मेरी नज़रें सब्ज़ी का ठेला लगाए एक वृद्ध पर जा टिकीं। बहुत कोशिश के बावजूद भी मैं उसको पहचान नहीं पा रहा था। लेकिन न जाने बार-बार ऐसा क्यों लग रहा था कि मैं उसे अच्छी तरह से जानता हूँ। मेरी उत्सुकता उससे भी छुपी न रही। उसके चेहरे पर आई अचानक मुस्कान से मैं समझ गया था कि उसने मुझे पहचान लिया था। काफ़ी देर की ज़हनी कशमकश के बाद जब मैंने उसे पहचाना तो मेरे पाँव के नीचे से मानो ज़मीन खिसक गई। जब मैं विदेश गया था तो इसकी एक बहुत बड़ी आटा मिल हुआ करती थी। नौकर-चाकर आगे-पीछे घूमा करते थे। धर्म-कर्म, दान-पुण्य में सबसे अग्रणी इस दानवीर पुरुष को मैं ताऊ जी कहकर बुलाया करता था। वही आटा मिल का मालिक और आज सब्ज़ी का ठेला लगाने पर मजबूर? 
मुझसे रहा नहीं गया और मैं उसके पास जा पहुँचा और बहुत मुश्किल से रुँधे गले से पूछा, “ताऊ जी, ये सब कैसे हो गया?”
भरी आँखें लिए मेरे कंधे पर हाथ रख रुँधे गले से उसने उत्तर दिया, “बच्चे बड़े हो गए हैं, बेटे।”

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2012 at 12:03pm

सादर धन्यवाद डॉ उमेश्वर श्रीवास्तव जी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2012 at 12:03pm

धन्यवाद माननीय नीलम उपाध्याय जी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2012 at 12:03pm

हार्दिक आभार गणेश भाई.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2012 at 12:03pm

आभार जोगेंद्र सिंह जी.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2012 at 12:03pm

आदरणीय जोगेश्वर गर्ग जी, दिल से आभार.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2012 at 12:02pm

शुक्रिया मजहर मसूद साहिब.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2012 at 12:02pm

हार्दिक आभार भाई धर्मेन्द्र सिंह जी.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2012 at 12:02pm

आभार रवि गुरु जी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2012 at 12:02pm

भाई नवीन चतुर्वेदी जी, लघुकथा पसंद करने के लिए हार्दिक आभार.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2012 at 12:01pm

आदरणीय सतीश मापतपुरी जी, लघुकथा पसंद करने के लिए दिल से शुक्रिया

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