आज ज़रूरत है
अपने अंदर झाँकने की
आपसी द्वेष और क्लेश से
ऊपर उठने की
सामने पड़ी वस्तु पर तो
शायद हम पैर न रखतें हैं
पर दूसरों की भावनाओं को
पैरों तले कुचलने में न झिझकते हैं
जात -पात वर्ण भेद के मानकों पर
इंसानों को बाँटने में लग गए हैं
एक दूसरे को नीचा दिखाने की हर
प्रतिस्पर्धा में बुरी तरह जुट गए हैं
पेड पत्थर कागज़ में तो
भगवान् का प्रतिरूप देख रहे हैं
भगवान् द्वारा बनाए इंसान में
भगवान् नहीं देख पा रहे हैं
जिस भगवान् को भटक भटक कर
हम चारों दिशाओं में खोजते हैं
अपने दिलों में झांककर
उनके वास को ,क्यूँ न तलाशते हैं
शायद हमारी मनःस्थिति
उस हिरन की सी हो रही है
जो अपनी नाभि छोड़कर
हर जगह कस्तूरी तलाश रही है
विजयाश्री
१९.१२.२०१२
(मौलिक और अप्रकाशित )
Comment
आ0 विजयाश्री जी,
’आज ज़रूरत है
अपने अंदर झाँकने की
आपसी द्वेष और क्लेश से
ऊपर उठने की’..... अतिसुन्दर। बधाई स्वीकारें। सादर,
पेड पत्थर कागज़ में तो
भगवान् का प्रतिरूप देख रहे हैं
भगवान् द्वारा बनाए इंसान में
भगवान् नहीं देख पा रहे हैं///////////बड़े सुन्दर भाव आदरणीया हार्दिक बधाई
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