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चलो  मुसाफिर  देख लो , कहाँ होगा गुजार |
ना दे सहारा कोई   , फिर से करो विचार |
खंजर मारें  पेट में , दूर से  मेहमान |
 देख  चिच्लाते चीखते, खुश हों  बेईमान |
अब  किस पर यकीन करे, अपना करता  घात |
जब अपना जहां छूटा , कौन सुनेगा बात |
आदमी बनता  बैरी , हरदम देखे राह | 
जाल बिछाये राह में , रख मारन की चाह |
शिकारियों को रोक लो , करते अत्याचार |
निर्दोषी हिरन घूमें , करते झपट शिकार |
कहीं शेर हमला करे , कहीं झपटता  बाज |
बेबस प्राणी क्या करे , किस तरह रखे लाज |
किस पर कब बिजली गिरे , बिन आंधी तूफ़ान |
मिल जाये  किस मोड़ पर , मानव बन  हैवान |
देव नहीं बचायेगें , भूलो पहली  बात |
अबला बलशाली बनो , दो दुश्मन को मात |
आग दहके जंगल में , डर से भागते  सब |
सब बैठे विनती करें , आकर बचाओ रब |
भीड़ भरे बाजार में , दहशत की  अफवाह |
वर्मा अब जायें कहाँ , आग भरी है राह |
श्याम नारायण वर्मा 

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on April 23, 2013 at 5:26pm

आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर बहुत सुन्दर रचना और रचना क्या सभी सुन्दर दोहे कहे हैं आपने यदि इसकी प्रस्तुति भी उसी प्रकार होती तो और भी सुन्दर लगता मुझे लगता है दो पंक्तियों को छोड़ दूँ तो सभी में दोहे के शिल्प को साधा गया लगता है. और भाव की बात करूँ तो वह भी बहुत ही सुन्दर. बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

Comment by Abhinav Arun on April 22, 2013 at 2:02pm
आदमी बनता  बैरी , हरदम देखे राह | 
जाल बिछाये राह में , रख मारन की चाह |
शिकारियों को रोक लो , करते अत्याचार |
निर्दोषी हिरन घूमें , करते झपट शिकार |
कहीं शेर हमला करे , कहीं झपटता  बाज |
बेबस प्राणी क्या करे , किस तरह रखे लाज |
किस पर कब बिजली गिरे , बिन आंधी तूफ़ान |
मिल जाये  किस मोड़ पर , मानव बन  हैवान |
बहुत सुन्दर भाव और विचार प्रधान रचना श्री श्याम जी हार्दिक बधाई आपको इस सुन्दर सृजन पर !!
Comment by coontee mukerji on April 22, 2013 at 3:46am

बुरे तत्वों   का इस प्रकार समाज में कंकड़ पत्थर चलाना .....इंसान जाए तो जाए कहाँ ? आपने एक बहुत ही कड़वे सत्य की ओर इशारा

किया है .श्याम नारायणजी  , बहुत बहुत बधाई  .सादर / कुंती .

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