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छोड़ आए गाँव में वो, ज़िंदगानी याद है।

सौंपकर पुरखे गए जो, वो निशानी याद है।

 

गाँव था सारा हमारा, ज्यों गुलों का इक चमन,

शीत, गर्मी, बारिशों की, ऋतु सुहानी याद है।

 

एक हो खाना खिलाना, रूठ जाने की अदा,

फिर मनाने मानने की, वो कहानी याद है।

 

छुप-छुपाते, खिलखिलाते, हँस हँसाते रात दिन,

फूल, बगिया, बेल-चम्पा, रात रानी याद है।

 

मुँह अँधेरे, त्याग बिस्तर, भागना भूले कहाँ?

हाथ में माँ से मिली, गुड़ और धानी याद है।

 

ज्ञान गुण के बोध का, कितना सुखद अहसास वो,

जो बुजुर्गों ने हमें दी, सीख वानी याद है।

 

आ गया उस गाँव में, झोंका अचानक लोभ का,

जब शहर ने छीन ली, हमसे जवानी याद है।

 

मौलिक व अप्रकाशित

 

कल्पना रामानी

Views: 784

Comment

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Comment by कल्पना रामानी on April 23, 2013 at 5:30pm

राम शिरो मणि जी, हार्दिक धन्यवाद....

Comment by कल्पना रामानी on April 23, 2013 at 5:29pm

आदरणीय विजय जी, हार्दिक आभार...

Comment by कल्पना रामानी on April 23, 2013 at 5:28pm

शालिनी जी, उत्साहवर्धन करने के लिए हार्दिक धन्यवाद...

Comment by shalini rastogi on April 23, 2013 at 4:44pm

बहुत सुन्दर गज़ल है कल्पना जी ....

Comment by vijay nikore on April 23, 2013 at 4:01pm

आदरणीया कल्पना जी:

 

//

गाँव था सारा हमारा, ज्यों गुलों का इक चमन,

शीत, गर्मी, बारिशों की, ऋतु सुहानी याद है।//  ... वाह...वाह

 

इस खूबसूरत रचना के लिए साधुवाद।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by ram shiromani pathak on April 23, 2013 at 3:17pm

आ गया उस गाँव में, झोंका अचानक लोभ का,

जब शहर ने छीन ली, हमसे जवानी याद है।//////////वाह क्या बात है आदरणीया बहुत ही सुन्दर //हार्दिक बधाई 

 

Comment by Shyam Narain Verma on April 23, 2013 at 12:11pm

Bahot khoob.................


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 23, 2013 at 12:10pm

आदरणीया कल्पना रामानी जी 

इस खूबसूरत गज़ल पेशकश पर दिल से दाद पेश है...स्वीकार करें 

बहुत बहुत बधाई 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 23, 2013 at 10:12am

आ0 रामानी जी,  सादर प्रणाम!   अतिसुन्दर गजल प्रस्तुति।  सादर बधाई स्वीकार करें।

Comment by Abhinav Arun on April 23, 2013 at 9:22am

एक हो खाना खिलाना, रूठ जाने की अदा,

फिर मनाने मानने की, वो कहानी याद है।

 वाह बहुत खूब आदरणीय कल्पना जी चुपके चुपके की याद ताज़ा हो आई .. सादगी और सन्देश परक इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई !!

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