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सघन वृक्ष सा विशाल अडिग,
तपन में शीतलता देता !
तुफानों से हर पल लड़ता ,
फिर भी सदा सहज वो दिखता !
अपनी इन्हीं बातो के कारण ,
वो एक पिता कहलाता !

.
कठोर सा यह दिखने वाला ,
दिल से कोमलता दिखलाता !
बेटी के दर्द से विचलित ,
डान्ट वरी माई डॉटर कहता !
पर उसकी विदाई पर वो ,
खुद को असहाय है पाता !
लाख चाहकर भी वो अपने,
अनवरत आँसू रोक ना पाता !
अपनी इन्हीं बातो के कारण ,
वो एक पिता कहलाता !

.
बात बात पर डाँट लगाता ,
सुरक्षा का बोध कराता !
ममतामयी माँ भी जब डाँटे ,
पिता बचा ले जाता !
समाज की नित बंदिशों  को ,
पिता तोड़ है पाता !
बेटी की एक चाहत पर वो ,
समाज से लड़ जाता !
बेटी को पढ़ा लिखा कर ,
नया केरियर दिलवाता !
अपनी इन्हीं बातो के कारण ,
वो एक पिता कहलाता !
       
“ मौलिक एवं अप्रकाशित ”

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Comment

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Comment by Shyam Narain Verma on June 18, 2013 at 4:35pm
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ.........................
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 16, 2013 at 7:38pm
आदरणीय...सुंदर अभिव्यक्ति, 'जीवन में सार्थक पिता के होने को खूब ही बेहतर ढंग से समझाया, कैसे पिता अपने दुख को छिपाकर, जीवन में अडिग रहता है ।.....आदरणीय हार्दिक शुभकामनाऐं
Comment by coontee mukerji on June 16, 2013 at 5:30pm
  • सघन वृक्ष सा विशाल अडिग,

              तपन में शीतलता देता !
       तुफानों से हर पल लड़ता ,
             फिर भी सदा सहज वो दिखता !
       अपनी इन्हीं बातो के कारण ,
              वो एक पिता कहलाता !.......पिता दिवस पर बहुत ही सुंदर उपहार .सादर/ कुंती

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