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बिछड़ा था हमसफ़र मेरा

अप्रैल की गर्मियों में 
मिले  न अब तक, 
उसके कोई निशान 
न आयी उसकी कोई चिट्ठी -खबर !!
.
गर्मियों से बरसात तक 
मिले जो राह में पदचिह्न मुझे 
उन पदचिह्नों को देख कर 
जाने कितनी बार अश्क बहाये  
कितनो के आगे रोया  
कही देखा है हमसफ़र मेरा !! 
.
उम्र के साथ अब ढल रही है नज़रे 
और थक रहा है बदन मेरा 
मगर मेरी उम्मीद कहती है 
मिलेगा एक दिन हमसफ़र तेरा ...
.
मेरे मरने से पहले
उससे मिला देना खुदा 
या मुझ तक भेज देना सन्देश उसका
कि वो जहाँ है बहुत खुश है 
ताकि सुकून  से मर सकू मैं !!!!
.
सुमित नैथानी 
 
मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Sumit Naithani on July 3, 2013 at 3:23pm

जितेंदर जी@ शुक्रिया ....

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 3, 2013 at 2:55pm
""उम्र के साथ अब ढलरही है नज़रे

और थक रहा है बदन मेरा

मगरमेरीउम्मीद कहती है

मिलेगा एक दिन हमसफ़र तेरा ...""बहुत ही खूबसूरत रचना, भाव से भरी हुई पंक्तियां.....""मेरेमरने से पहले

उससे मिला देना खुदा

या मुझ तक भेज देनासन्देश उसका

कि वो जहाँ है बहुत खुश है

ताकि सकू न से मरसकू मैं !!!!....""विरह की अदभुत परिभाषा को सहजता से बतलाती रचना! बहुत ही सुंदर आदरणीय....सुमित भाई, दिल की गहराइयों से शुभकामनाऐं

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