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बहर : २१२ २१२

--------

जो सरल हो गये

वो सफल हो गये

 

जिंदगी द्यूत थी

हम रमल हो गये

 

टालते टालते

वो अटल हो गये

 

देख कमजोर को

सब सबल हो गये

 

भैंस गुस्से में थी

हम अकल हो गये

 

जो गिरे कीच में

वो कमल हो गये

 

अपने दिल से हमीं

बेदखल हो गये

 

देखकर आइना

वो बगल हो गये
---------------

(मौलिक एवम् अप्रकाशित)

Views: 855

Comment

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Comment by वीनस केसरी on July 11, 2013 at 2:10am

ऐसी छोटी बहर में मुरद्दफ़ ग़ज़ल कह लेना ही अपने आप में हैरत की बात है और आगे कमाल यह की आपने अशआर में कमाल ही कर दिखाया है भाई
ढेरो दाद कबूल करें

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 8, 2013 at 10:05pm

शुक्रिया MAHIMA SHREE जी

Comment by MAHIMA SHREE on July 7, 2013 at 3:19pm

देखकर आइना

वो बगल हो गये... :)) आदरणीय धर्मेन्द्र सर .. बहुत ही अच्छी गजल .. बहुत हार्दिक बधाई आपको

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 7, 2013 at 2:23pm

बहुत बहुत शुक्रिया shashi purwar जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 7, 2013 at 2:23pm

शुक्रिया विजय मिश्र जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 7, 2013 at 2:22pm

धन्यवाद Jitendra Pastariya जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 7, 2013 at 2:22pm

शुक्रिया  coontee mukerji जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 7, 2013 at 2:22pm

शुक्रिया ram shiromani pathak जी

Comment by shashi purwar on July 6, 2013 at 11:22pm

waah sundar gajal ,dharmendra ji muskaan bhi mil gayi isme भैंस गुस्से में थी

हम अकलहो गये"" वाह!

Comment by विजय मिश्र on July 6, 2013 at 5:13pm
वाह वाह धर्मेन्द्रजी , सुंदर ,बधाई

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