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एक गजल पेश है, वज्न २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ 
.
फिर सूने दिल का सूना पन उफ़ तौबा तौबा 
सूखा अम्बर बंजर आंगन उफ़ तौबा तौबा 
.
दिल बेचारा हारा हारा सौतन जीती फिर 
मेरे भोले सैयां का मन उफ़ तौबा तौबा 
.
एक चौराहा चारों राहें मन भटकाती है
मंजिल गुम बेमतलब जीवन उफ़ तौबा तौबा  
.
हम तो बिसरी सूरत फिर से लेके बैठे है 
उनका नादाँ जिद्दी बचपन उफ़ तौबा तौबा 
.
चंदा मामा सूरज काका सब रिश्ते झूठे 
अब तो अपना सा हर दुश्मन उफ़ तौबा तौबा 
.
ऊँचाई पे जाकर सब कुछ छोटा दिखता है 
कैसा नजरों का पागलपन उफ़ तौबा तौबा 
. 
खेतों की हरियाली में मौसम मौसम हम  
औ पीली चूड़ी की छनछन उफ़ तौबा तौबा 
. 
(मौलिक/अप्रकाशित)

Views: 1690

Comment

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Comment by वेदिका on July 6, 2013 at 3:30pm

शुक्रिया आपका आदरणीया प्रज्ञा जी!

Comment by Pragya Srivastava on July 6, 2013 at 3:23pm

  गीतिका जी,                               बहुत ही सुंदर गजल

Comment by वेदिका on July 5, 2013 at 9:49pm

आपका आभार आदरणीय कविता जी!

पुनः आभार राम भैया!! 

Comment by वेदिका on July 5, 2013 at 9:36pm

आदरणीय कुन्ती जी! 

आपने रचना कर्म को सराह के जो प्रोतसाहन दिया, गजल को सराहा ये हम जैसो नवोदितों के लिए बहुत महत्व और ख़ुशी की बात है 

के लिए बहुत महत्व पूर्ण बात है

 चंदा मामा और सूरज काका से मेरा तात्पर्य हमारे उन तथाकथित रिश्तो से भी है जो होने को हमारे खान दान के एक हुक है लेकिन यतार्थ में अपनी अनुपयोगिता ही साबित करते है 
आपका पुनः बहुत बहुत आभार  

Comment by Kavita Dhiman on July 5, 2013 at 9:33pm

बहुत बढ़िया गीतिका जी .

Comment by coontee mukerji on July 5, 2013 at 8:59pm

वेदिका जी,वकई आपकी लिखी हुई एक एक गज़ल में युवा  दिल की धड़कनें और बेताबियाँ छिपी हुई है.

एक चौराहा चारों राहें मन भटकाती है

मंजिल गुम बेमतलब जीवन उफ़ तौबा तौबा........सच में तौबा..तौबा.

चंदा मामा सूरज काका सब रिश्ते झूठे 

अब तो अपना सा हर दुश्मन उफ़ तौबा तौबा.........ये बेचारे क्या करेंगे इनके वश में सब कुछ थोड़े ही होते हैं इन्हें बक्श देना ही बेहतर है.

खेतों की हरियाली में हम रूमानी मौसम 

औ पीली चूड़ी की छनछन उफ़ तौबा तौबा.........ये अंदाज़ भी खूब है दिलवालों के लिये.

देविका जी, एक ही शब्द में कहूँ.....excellent.

Comment by ram shiromani pathak on July 5, 2013 at 8:40pm

ये तो आपकी महानता है  दीदी  जो इस अनुज को आप इतना मान दे रही हैं!!

Comment by वेदिका on July 5, 2013 at 7:32pm

आपका तहे दिल से आभार राम भैया!!  जब तक आपकी बधाई न मिले अधुरा सा लगता है :))

Comment by वेदिका on July 5, 2013 at 7:30pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी! नमन!!

 

दिल बेचारा हारा हारा सौतन जीती फिर 
मेरे भोले सैयां का मन उफ़ तौबा तौबा ------//ऐसे सैयां को भोला तो बिलकुल नहीं मानूंगी//
आपका कथन बिलकुल सही है मै भी सैयां को भोला  नही मानती,, लेकिन ये अंतर्मन है न हमसे विपरीत ही चलता है, उसे अपने सिक्के में कोई खोट नही दिखाई देती :))) शायद  इसी को अपनापन कहते है ,, हम जब किसी से प्रेम करते है तो उसकी बुराइयाँ भी अपनी होती है :)))।     
एक चौराहा चारों राहें मन भटकाती है
मंजिल गुम बेमतलब जीवन उफ़ तौबा तौबा  ---
नहीईई ये तो डिप्रेसन के लक्षण है बेबी // आपकी इस बात से भी सर्वथा सहमत हूँ,, लेकिन दिग्भ्रमित इन्सान अपने आपको कही का नही पाता !! 
चंदा मामा सूरज काका सब रिश्ते झूठे 
अब तो अपना सा हर दुश्मन उफ़ तौबा तौबा ----//अब तो हर अपना  दुश्मन सा उफ़ तौबा तौबा कहेंगी तो बात स्पष्ट होगी//  आपका कथन सही है, लेकिन अगर मै इसको अपनाती हूँ तो मेरा  कथ्य बदल जायेगा, मेरा अपना तो दुश्मन है ही, इसलिए  दुश्मन में ही अपनापन नजर आया   
 अब तो अपना सा हर दुश्मन उफ़ तौबा तौबा,,, यहाँ मेरे कहने  का तात्पर्य है की अब दुश्मन में ही अपने लोग दिखाई देते है, क्युकी अपने रिश्ते झूठे साबित हुए  
आशा है की मै अपने सम्प्रेषण में सफल हुयी,,  आपका बहुत बहुत आभार आपने इतनी रूचि से रचना कर्म को पढ़ के धन्य किया!! 
Comment by ram shiromani pathak on July 5, 2013 at 7:07pm

वाह वाह गीतिका दीदी बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल कही है आपने//हार्दिक बधाई आपको

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