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Pragya Srivastava
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सिसकियाँ भरते रहे हम रात भर

सिसकियाँ भरते रहे हम रात भर

चाँद ने भी देखा पर कुछ ना कहा

हवाएँ भी सुनकर चलती रही

दर्द सीने में लहरों सा उठता रहा

चाँदनी बादलों में छुपने लगी

सांस भी रह-रह कर रूकने लगी

सिर्फ बची मैं और मेरी तन्हाईयाँ

यादें करती रही पीछा बनकर परछाइयाँ

घटाओं ने समझा दर्द बस मेरा

बरसती रही वो रात भर

जख्म रिस-रिस कर ऐसे बहने लगे

घाव मरहम की ख्वाहिश में सहने लगे

पिघलकर रूह बिछने लगी

साया भी खुद से सहमने लगा

लौ जलती रही मगर तेल कम था

एक…

Continue

Posted on June 18, 2014 at 5:30pm — 9 Comments

माँ

तेरी गोद में सोकर
कितना सकून मिलता है माँ
प्यार भरा हाथ सहलाती हो जब
दर्द ना जाने कहाँ हो जाता है गुम
तुम हो मेरे पास तो मुझे लगता नही डर
तेरी ममता की छांव मिलती रहे मुझे
मेरी तो बस है इतनी सी तमन्ना

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on May 10, 2014 at 7:32pm — 5 Comments

कैसे भूलाऐ जा पाऐगे

बचपन की वो सुन्दर यादें

गांव की मिट्टी,पेड़ों के झूले

कैसे भूलाए जा पाऐगे

रोना,हसना,और मचलना

गिरना,गिरकर फिर से संभलना

कैसे भूलाए जा पाऐगे

पगडन्डी पर दौड़ लगना

खुली हवा से बातें करना

कैसे भूलाए जा पाऐगे

तितली,बन्दर और गिलहरी

मोदक,मक्खन और जलेबी

कैसे भूलाए जा पाऐगेम

माँ की रोटी,दादी की कहानी

छुटपन की सहेली मीना,रानी

कैसे भूलाऐ जा पाऐगे

बाबू जी का डान्ट लगाना

और प्यार से गोद उठाना

कैसे भूलाऐ जा पाऐगे

सावन के… Continue

Posted on April 14, 2014 at 1:27pm — 12 Comments

मेरी माँ

मेरी माँ है सबसे सुन्दर
फूल सरीखी माँ
श्रृद्धा ,त्याग ,तपस्या की
मूरत मेरी माँ
चन्दन और कुमकुम सी
लगती मेरी माँ
बाधाओं से कभी न हारे
ऐसी मेरी माँ
पूजा की घन्टी सी हरदम
बजती मेरी माँ
गीता,वेद,पुराणों में भी
मिलती मेरी माँ
मौलिक व अप्रकाशित

Posted on April 11, 2014 at 11:51pm — 10 Comments

Comment Wall (2 comments)

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At 5:51pm on June 17, 2013, D P Mathur said…

आदरणीया प्रज्ञा जी कविता पसंद करने के लिए शुक्रिया !

At 7:42am on June 12, 2013, D P Mathur said…

आदरणीया प्रज्ञा जी आपका आभार । डी पी माथुर 

Profile Information

Gender
Female
City State
Jaipur , Rajasthan
Native Place
Jaipur
Profession
Teacher
 
 
 

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