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विज्ञान के विद्यार्थी का प्रेम गीत

अवकलन समाकलन
फलन हो या चलन-कलन
हरेक ही समीकरन
के हल में तू ही आ मिली

घुली थी अम्ल क्षार में
विलायकों के जार में
हर इक लवण के सार में
तु ही सदा घुली मिली

घनत्व के महत्व में
गुरुत्व के प्रभुत्व में
हर एक मूल तत्व में
तु ही सदा बसी मिली

थीं ताप में थीं भाप में
थीं व्यास में थीं चाप में
हो तौल या कि माप में
सदा तु ही मुझे मिली

तुझे ही मैंने था पढ़ा
तेरे सहारे ही बढ़ा
हुँ आज भी वहीं खड़ा
जहाँ मुझे थी तू मिली

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Comment

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Comment by satish mapatpuri on December 14, 2010 at 3:41pm

थीं ताप में थीं भाप में
थीं व्यास में थीं चाप में
हो तौल या कि माप में
सदा तु ही मुझे मिली

विज्ञान के विधान को आपने एक नया आयाम दिया है.विज्ञान की जटिलता में आपने रूहानी कमनीयता को तलाशा है, यह वाकई अदभुत है . धर्मेन्द्र जी , साधुवाद

Comment by Rash Bihari Ravi on December 13, 2010 at 5:01pm

bah kya bat hain jabardast

Comment by Bhasker Agrawal on December 13, 2010 at 4:44pm

बहुत सुंदर प्रस्तुति

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