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अच्छा !!!!

तो प्रेम था वो !!!

 

जबकि केंद्रित था लहू का आत्मिक तत्व

पलायन स्वीकार चुकी भ्रमित एड़ियों में !

किन्तु -

एक भी लकीर न उभरी मंदिर की सीढियों पर !

एड़ियों से रिस गईं रक्ताभ संवेदनाएं !

भिखमंगे के खाली हांथों की तरह शुन्य रहा मष्तिष्क !

 

हृदय में उपजी लिंगीय कठोरता के सापेक्ष

हास्यास्पद था-

तोड़ दी गई मूर्ति से साथ विलाप !

विसर्जित द्रव का वाष्पीकृत परिणाम थे आँसू !

 

हाँ !

शायद प्रेम ही था !

अभीष्ट को निषिद्ध में तलाशती हुई ,

संडास में स्खलित होती बीमार पीढ़ी का प्रेम !

.

.

.

................................................. अरुन श्री !

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Arun Sri on August 7, 2013 at 10:13am

आदरणीय श्याम जुनेजा सर , आपकी टिप्पणी , आपकी चेतावनी सर -माथे ! अभी सिखने की प्रक्रिया में हूँ ! शीर्षस्थ विचारक के हिसाब से कमियां तो होंगी ही ! और आपने ठीक कहा , मैं नकारात्मक भावों को अपने जीवन में महसूस कर रहा हूँ पिछले कुछ महीनों से !
अक्सर ऐसी घटनाएँ होतीं हैं जब प्यार में असफल प्रेमी अपनी प्रेयसी को सजा देते हैं , फिर खुद को ! खुद को सजा दे लेने से उनके प्रति सहानिभूति रखने वाले भी खड़े हो जाते हैं ! अभी हाल ही में हुई JNU वाली घटना को प्रेम कहे जाते देखकर जो मन में आया , लिख दिया ! अच्छा लगा कि आपने चेताया ! सतत मार्गदर्शन करते रहें ! सादर !

Comment by Arun Sri on August 6, 2013 at 11:22am

अरुन अनंत भाई , रचना आपके अंतर्मन तक पहुँच सकी तो सफल हुआ लिखना ! धन्यवाद !

Comment by Arun Sri on August 6, 2013 at 10:41am

कवि राज बुन्देली सर , आश्चर्य कि आपने सराहा जबकि आपके सुसंस्कृत विचार इस कविता से भिन्न हैं !
अत्यंत सुखद !
धन्यवाद !

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 6, 2013 at 9:54am

गहन भाव पिरोये अंतर्मन को स्पर्श करती सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई भाई अरुन श्री जी.

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on August 5, 2013 at 9:21pm

वाह्ह्ह्ह्ह्ह सुन्दर रचना हेतु बधाई अरुन भाई

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