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नींद चीज है बड़ी  उंघते रहिए

बेफिक्री में आंखे मूंदते रहिए

आग लगती है लगे हमको क्‍या

आम दशहरी जनाब चूसते रहिए

मौका मिले तो तंज कर लो

नहीं तो मस्‍ती में झूमते रहिए

आसां नहीं है अ‍हम को तोड़ना

दुनिया अजब है घूमते रहिए

अदाकार आप खूब है जनाब 

सूत्रधार की भूमिका निभाते रहिए

बातें विक्षिप्‍त की है आपसे बाहर

हंसी चेहरे पर कूटिल दिखाते रहिए 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by रौशन जसवाल विक्षिप्‍त on August 15, 2013 at 8:25am

आदरणीय आशुतोष जी और सौरभ जी आभार आपका आपने प्रोत्‍साहित किया 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 15, 2013 at 7:39am

आग लगती है लगे हमको क्‍या

आम दशहरी जनाब चूसते रहिए   बेहतरीन ग़ज़ल के इस शेर का जवाब नहीं   हार्दिक बधाई के साथ 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 14, 2013 at 11:19pm

आदरणीय रौशन विक्षिप्तजी, आपकी द्विपदियों में इतनी ताकत है कि आपनी बात जगह तक पहुँचा सके. लेकिन इसके अलावे भी आपको इन्हें सुगढ़ करना होगा. क्योंकि विधा का सकारात्मक व्यवहार संप्रेषणीयता को ठोस आधार देता है. ऐसा मेरा मानना है. 

सादर

Comment by विजय मिश्र on August 13, 2013 at 4:05pm
वाह ! अभिव्यक्ति का ढंग अनूठा है ,आज के इस बिलासी जीवन शैली पर पावरफुल तंज भी है . बहुत सुंदर .बधाई रौशनजी
Comment by रौशन जसवाल विक्षिप्‍त on August 12, 2013 at 10:30pm

आदरणीय केवल प्रसाद जी आपको स्‍नेह प्राप्‍त हुआ आभार आपने प्रोत्‍साहित किया

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 12, 2013 at 9:53pm

आ0 रौशन भाई जी, अच्छा प्रयास हुआ है। कृपया गजल की बह्र अवश्य लिख दिया करें। जिससे कहन को समझने में आसां हो जाता है। कहीं कहीं बह्र समझ में नहीं आ रही है। शुभ शुभ...सादर

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