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माँग भरकर सुहागन खड़ी रह गई

ख़्वाब पूरे हुए आस भी रह गई
जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई

फ़ौज से लौट कर आ सका वह नहीं   

माँग भरकर सुहागन खड़ी रह गई 

खैर तेरी खुदा से रही मांगती  

चाह तेरी मुझे ना मिली रह गई 

छोड़ कर तुम भँवर में न होना खफा 

घाव दिल को दिए जो छली रह गई 

आजमाइश तूने की अजब है सबब 

मांगने में कसर जो कहीं रह गई 

प्यार गुल से निभा बुल फिरे पूछती  

आरजू में बता क्या कमी रह गई 

घाव बुल को मिले हो गई अजनबी 

आरजू अब अधूरी पड़ी रह गई 

*******

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Sarita Bhatia on August 24, 2013 at 10:18am

आदरणीया अन्नपूर्णा जी हार्दिक आभार 

Comment by Abhinav Arun on August 24, 2013 at 5:05am

सच्चे भावों का सुन्दर चित्रण ...बहुत सशक्त रचना ..हार्दिक बधाई आ. सरिता जी !

Comment by annapurna bajpai on August 23, 2013 at 9:01pm

आदरणीय सरिता जी सुंदर पंक्तियाँ , बढ़िया भाव । बधाई । 

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