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धरती भी काँप गयी

----------------------

उड़ान भरती चिड़िया

जलती दुनिया

आंच लग ही गयी

---------------------

दाढ़ी बाल बढ़ाये

साधू कहलाये

चोरी पकड़ा ही गयी

-------------------------

इतना बड़ा मेला

पंछी अकेला

डाल भी टूट गयी

----------------------

खंडहर भी चीख उठा

रक्त-बीज बाज बना

धरती भी काँप गयी

------------------------

कानून सोया था

सपने में रोया था

देवी जी भांप गयीं

-----------------------

जल्लाद जाग उठा

गीता को बांच रहा

सुई आज थम गयी

------------------------

'एक' माँ रोई थी

'एक ' आज रोएगी

अपना ही खोएगी

------------------------

"मौलिक व अप्रकाशित"

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'५

१ २ . १ ५  पूर्वाह्न -1 २ . ३ ४ पूर्वाह्न

कुल्लू हिमाचल

२ ५ .० ८ - १ ३

Views: 536

Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 28, 2013 at 7:40pm

सुन्दर और सामयिक रचना के माध्यम से गंभीर पीड़ा व्यक्त करती रचना के लिए हार्दिक बधाई श्री सुरेन्द्र भ्रमर जी |

Comment by विजय मिश्र on August 28, 2013 at 11:20am
परिप्रेक्ष्य पीड़ादायी ,विषय व्यापक ,असहनीय और निंदनीय स्थितियाँ ,संदर्भों पर समुचित प्रहार , छंदाबद्ध यथार्थपरक सुगम रचना .साधुवाद सुरेंद्रजी .
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 28, 2013 at 11:05am

बहुत खूब! बेहद सुंदर रचना, हार्दिक बधाई आदरणीय सुरेन्द्र जी

Comment by annapurna bajpai on August 27, 2013 at 10:53pm

वाह !!!!!!!!! अति सुंदर आ० भ्रमर जी , बधाई आपको । 

Comment by बृजेश नीरज on August 27, 2013 at 5:13pm

बहुत खूब! अति सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 27, 2013 at 3:42pm

वर्तमान परिस्थिति का बेहद सुन्दरता से वर्णन किया है आपने, अंतिम बंद ने दिल जीत लिया आदरणीय बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 27, 2013 at 1:18pm

सुन्दर रचना !! भाई सुरेन्द्र !! बधाई !!

Comment by Shyam Narain Verma on August 27, 2013 at 11:08am
बहुत ही सुन्दर! हार्दिक बधाई आपको!

कृपया ध्यान दे...

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