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होंठ हंसते हैं मगर मन में बवंडर क्यों है ? 
आँखें सोती हैं पर इस नींद में अंतर क्यों है? 
जानते हैं की दो तन एक जान हैं हम. . 
फिर भी,हर मोड़ पे दूरी ही मुक़द्दर क्यों है ? 

 
हम ने तो साथ साथ चलने की खाई थी कसम.. 
साथ देखे थे सपने, निभाई थी हर रस्म.. 
हम ने विश्वास की डोरी से खुद को बाँधा था .. 
आज उस डोर में पड़ती हुई गाँठें क्यों हैं ? 

 
जाने कब से  हुआ शुरू ,और चलने लगा.. 
बन के विष ज़िंदगी में घुलने लगा.
अब तो हम साँस भी नही लेते कभी पूरी तरह.. 
एक चेहरे पे,अनगिनत ,ये मुखौटे क्यों हैं ?

 
जाने अंजाने हर भीड़ में ही .. 
ढूँढती हूँ मैं चेहरा सच का.. 
खूबसूरत चेहरों में ज़रा बदसूरत .. 
नही मिलता, फिर भी बस, ढूँढती हूँ.. 



मुखौटा सच का ..????????? 

 

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Comment

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Comment by Lata R.Ojha on December 28, 2010 at 8:34pm
@ Navin ji : sach.. aur sochti hoon ki kaash aisa na hota to behtar hota.. [der se reply ke liye maaf kijiyega ]
Comment by Lata R.Ojha on December 28, 2010 at 7:03pm
आभार सतीश जी :) 
Comment by satish mapatpuri on December 28, 2010 at 5:19pm
 
होंठ हंसते हैं मगर मन में बवंडर क्यों है ? 
आँखें सोती हैं पर इस नींद में अंतर क्यों है? 
जानते हैं की दो तन एक जान हैं हम. . 
फिर भी,हर मोड़ पे दूरी ही मुक़द्दर क्यों है ? 
बहुत खुबसूरत. शुक्रिया लताजी. 
Comment by Lata R.Ojha on December 28, 2010 at 4:46pm
धन्यवाद गिरी जी और गणेश जी . आप सब की उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया और भी बेहतर लिखने को प्रेरित करती हैं :) 
Comment by Rash Bihari Ravi on December 28, 2010 at 1:19pm
khubsurat lajabab

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 28, 2010 at 10:41am

ढूंढ़ते रह जाओगे.....

लता जी, आप की इस बेहतरीन काव्य कृति को पढ़ मैं अभिभूत हूँ और किसी फिल्म का यह गीत यह याद आ रहा है ........

जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते है लोग,

एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते है लोग |

बेहतरीन प्रस्तुति और यह दो पक्ति....

हम ने विश्वास की डोरी से खुद को बाँधा था .. 
आज उस डोर में पड़ती हुई गाँठें क्यों हैं ?
बधाई इस शानदार अभिव्यक्ति पर, उम्मीद करते है कि आगे भी आप कि रचनायें और अन्य रचनाकारों कि रचनाओं पर आपका बहुमूल्य विचार प्राप्त होगा |

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