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!!! डर गई है यह धरा !!!
बह्र -2122 212


मिल गया रब देख ले।
क्या मिला सब देख ले।।


जिंदगी है मौत सी,
कल कहां कब देख ले।


राम जाने क्या हुआ,
आसमां अब देख ले।


रात काली हो गयी,
बर्फ का ढब देख ले।


कल जहां पर जश्न था,
मौत-घर अब देख ले।


फिर अहम आलाप है,
भोर की शब देख ले।


हम किसे आवाज दे,
साथ में रब देख ले।


रात ढलती जा रही,
निश अजायब देख ले।


आज आभा कोसती,
लाल बेढब देख ले।


चींख कर रोती रही,
हाय! करतब देख ले।


सो गया है आसमां,
रंग-मजहब देख ले।


डर गई है यह धरा,
रोज आफत देख ले।


चल रही है आंधियां,
रूख हवा अब देख ले।


के0पी0सत्यम/मौलिक व अप्रकाशित

Views: 698

Comment

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Comment by vijay nikore on September 16, 2013 at 4:24am

आदरणीय केवल प्रसाद जी:

 

इस सुन्दर रचना के लिए बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 15, 2013 at 11:57am

आदरणीय केवल भाई जी रचना बहुत ही अच्छी बन पड़ी है किन्तु मुझे ग़ज़ल की बहर पर संदेह है, क्या यह बहर मान्य है? कृपया मेरी शंका का निवारण करें. रचना पसंद आई इस हेतु ढेरों बधाई स्वीकारें.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on September 15, 2013 at 9:26am

आदरणीय अन्नपूर्णा जी,  सादर प्रणाम!  आपके स्नेह और गजल की सराहना हेतु आपका तहेदिल शुकि्रया, आभार।   सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on September 15, 2013 at 9:23am

आदरणीय लड़ीवाला सर जी, सादर प्रणाम! आपके स्नेह और गजल पर सराहना हेतु आपका तहेदिल शुकि्रया, आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on September 15, 2013 at 9:21am

आदरणीय जितेन्द्र भार्इ जी,  सादर प्रणाम!  आपके स्नेह और गजल पर सराहना हेतु आपका तहेदिल शुकि्रया, आभार। ़ सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on September 15, 2013 at 9:20am

आदरणीय भण्डारी भार्इ जी, सादर प्रणाम! आपके स्नेह और गजल पर अपार सराहना हेतु आपका तहेदिल शुकि्रया, आभार।   सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on September 15, 2013 at 9:08am

आदरणीय आशुतोष भार्इ जी, सादर प्रणाम! आपके स्नेह और गजल पर अपार स्नेह हेतु आपका तहेदिल शुकि्रया, आभार।   जी, मैं भी अभी ओ0बी0ओ0 की गजल की कक्षा से सीख ही रहा हूं,  यहां पर सीखने की सामाग्री अत्यंत सरल और श्रेष्ठ स्तर की है। मेरी समझ में इससे बेहतर सामाग्री ढूढे से भी नहीं मिलेगी। मैंने कर्इ नामीगिरामी गजलकारों की गजल पढ़ी है। किन्तु मेरे आदर्श आदरणीय मुनव्वर राणा साहेब व आदरणीय वीनस केसरी जी हैं, जिन पर मैं आंख मूंद कर विश्वास करता हूं। सादर,

Comment by annapurna bajpai on September 14, 2013 at 10:48pm

आ0 केवल भाई जी सुंदर संदेश स्ंप्रेषित करती हुई रचना बधाई स्वीकारें ।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 14, 2013 at 6:02pm

छोटी सुन्दर और लाजवाब गजल रचना के लिए बधाई श्री केवल प्रसाद जी 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 14, 2013 at 2:26pm

कल जहां पर जश्न था,
मौत-घर अब देख ले। ......वाह! क्या कहने..

चल रही है आंधियां,
रूख हवा अब देख ले।......बहुत खूब, सबसे पसंदीदा शेर

बेहद शानदार गजल , दाद कुबूल कीजिये आदरणीय केवल जी

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