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ग़ज़ल - जंग न होगी तो होगा नुक्सान बहुत

आदरणीय चन्द्र शेखर पाण्डेय जी की ग़ज़ल से प्रेरित एक फिलबदी ग़ज़ल ....


२२ २२ २२ २२ २२ २

ये कैसी पहचान बनाए बैठे हैं
गूंगे को सुल्तान बनाए बैठे हैं

मैडम बोलीं आज बनाएँगे सब घर   
बच्चे हिन्दुस्तान बनाए बैठे हैं

 

आईनों पर क्या गुजरी, क्यों सब के सब,   

पत्थर को भगवान बनाए बैठे हैं

 
धूप का चर्चा फिर संसद में गूंजा है
हम सब रौशनदान बनाए बैठे हैं

जंग न होगी तो होगा नुक्सान बहुत  
हम कितना सामान बनाए बैठे हैं

वो चाहें तो और कठिन हो जाएँ पर
हम खुद को आसान बनाए बैठे हैं

पल में तोला पल में माशा हैं कुछ लोग
महफ़िल को हैरान बनाए बैठे हैं

जान हमारी ले लेंगे वो, क्योंकि हम अब    
उनको अपनी जान बनाए बैठे हैं

सय्यादों से सुबहो शाम दाने पा कर

पिंजड़े को हम शान बनाए बैठे हैं

आप को सोचें दिल को फिर गुलज़ार करें

क्यों खुद को वीरान बनाए बैठे हैं  


आपकी खिदमत में हाजिर हैं हम हर पल
खुद को पुल, सोपान बनाए बैठे हैं

सोपान - सीढ़ी


 मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by गिरिराज भंडारी on September 18, 2013 at 2:05pm

आदरणीय वीनस भाई , बात कैसे कही जानी चाहिये हर शे र समझा रहा है !! अति सुन्दर  !! बधाई !!

पिंजड़े और आपकी दो शब्दों की मात्रा  के विषय मे विस्तार से बताने की कृपा करें !! सादर !!

Comment by annapurna bajpai on September 18, 2013 at 1:51pm

आदरणीय केसरी जी , सुंदर जवाब गजल हार्दिक बधाई ।

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on September 18, 2013 at 11:19am

आदरणीय वीनस जी, आप तो हमारे लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। आपने पुन: इस उदाहरण को प्रस्तुत कर हमारे संशय को दूर कर दिया कि इस बहर में कैसे लिखा जाय। आपने मान दिया, आपका बड़प्पन। शुक्रिया, आदाब्


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 18, 2013 at 10:34am

वाह वीनस जी एक और खूबसूरत ग़ज़ल और इसका हर शेर लाजवाब और जनमानस के मन मे  एक सवाल छोड़ता,

इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिये दिली दाद कुबूल फरमायें

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