For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

गज़ल - गांधियों के रूप में ढलते गए

बह्र -- रमल मुसद्दस महजूफ
२१२२, २१२२, २१२
हम चले थे आस में चलते गए
और वो सब हाथ ही मलते गए

खूबसूरत रुत न थी औ रहगुज़र
तीरगी की बाढ़ को छलते गए

खूब रोका कंटकों नें राह में
राह में हम फूल सा खिलते गए

कह रहीं थीं आँधियाँ रुक जा जरा
आँधियों सा राह में चलते गए

झूठ आया रूप धर के सामने
गांधियों के रूप में ढ़लते गए

देख सुन कह मत गलत बुनते रहे
वानरों के पेट भी पलते गए

या खुदा तूने न देखा कारवाँ
चाँदनी ले हाथ में चलते गए

पूनम शुक्ला

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 786

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Poonam Shukla on September 23, 2013 at 10:21am
मैंने अभी तक जितनी भी ग़ज़लें पढ़ी हैं उनमें से पचास प्रतिशत ग़ज़लों में अ का काफ़िया पढ़ा ।तो क्या वो सब गलत है ?
Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on September 23, 2013 at 10:12am

रचना का भाव सुन्दर है पूनम जी !
गिरिराज जी और वीनस भाई जी की बातों का संज्ञान लेते हुए इसे ग़ज़ल में परिवर्तित कीजियेगा !
शुभकामनाएं !!

Comment by वीनस केसरी on September 21, 2013 at 11:07pm

रचना पर अच्छी चर्चा हुई ... विश्वास है जल्द ही इसका संशोधित रूप पढ़ने को मिलेगा जिसमें हम इसे ग़ज़ल की संज्ञा दे सकेंगे
सादर

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 21, 2013 at 4:40pm

आदरनीया आपके प्रयास पर हार्दिक बधाई ...बैसे आदरणीय गिरिराज जी बिलकुल सही कह रहे हैं ..बिना काफिया के ग़ज़ल नहीं हो सकती ..सादर बधाई के साथ 

Comment by annapurna bajpai on September 20, 2013 at 10:46pm
आ0 पूनम जी सुंदर गजल के लिए आपको बधाई ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 20, 2013 at 7:35pm

आदरणीय पूनम जी मेरी एक गज़ल ( जिसमे काफिया नही है ) जो आदरणीय वीनस भाई बिना काफिये की गज़ल नही हो सकती कह के खारिज किये थे और मुझे पोस्ट वापस ले ने को कहेव थे , उसका मतला लिख रहा हूँ  आप खुद समझ जायेंगी  , ( छोटी अ ) को काफिया नही माना जाता , ऐसा वीनस भाई का कहना है !!

सुब्ह से ही भूख उसके घर मे आ के बैठ जाती

मुफलिसी भी साथ आ के साथ उसके लेट जाती ----- इसमे काफिया नही है , मुझे पोस्ट वापिस लेना पडा था ! वैसे आप चाहें तो जानकार से और पूछ लें !

Comment by Poonam Shukla on September 20, 2013 at 7:21pm
अभिनव अरुण जी आपका हार्दिक आभार ।मैं अभी गज़ल सीखने का प्रयास कर रही हूँ ।
Comment by Poonam Shukla on September 20, 2013 at 7:19pm
भंडारी जी मेरे हिसाब से आस ,साथ,राह ,हाथ ये काफिया है ।कुछ कमी हो तो मार्गदर्शन करें ।
Comment by Abhinav Arun on September 20, 2013 at 6:48pm

हम चले थे आस में चलते गए
रोशनी थी साथ में चलते गए

           ...... मतला अच्छा हुआ है बधाई आ. पूनम जी !! ख़याल और अदायगी अच्छी है !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 20, 2013 at 2:05pm

आदरणीया पूनम जी सुन्दर बात , सुन्दर रचना के लिये बधाई !! आदरणीया लेकिन काफिया नही है ऐसा लगता है ? में चलते गए 

रदीफ है , तो काफिया ?क्षमा करें , अगर आपने गज़ल कही है तो , मुझे लगता है ये रचना गज़ल की परिधि मे नही आ रही है !!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहे -रिश्ता
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी रिश्तों पर आधारित आपकी दोहावली बहुत सुंदर और सार्थक बन पड़ी है ।हार्दिक बधाई…"
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"तू ही वो वज़ह है (लघुकथा): "हैलो, अस्सलामुअलैकुम। ई़द मुबारक़। कैसी रही ई़द?" बड़े ने…"
Monday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"गोष्ठी का आग़ाज़ बेहतरीन मार्मिक लघुकथा से करने हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह…"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आपका हार्दिक आभार भाई लक्ष्मण धामी जी।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई।"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"ध्वनि लोग उसे  पूजते।चढ़ावे लाते।वह बस आशीष देता।चढ़ावे स्पर्श कर  इशारे करता।जींस,असबाब…"
Sunday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"स्वागतम"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
Saturday

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service