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ग़ज़ल - सितम सारे सहें कुछ यूँ

1222. 1222

चलो चल कर कहें कुछ यूँ
सितम सारे सहें कुछ यूँ

रियावत ओढ़ लें थोड़ा
जुदाई को सहें कुछ यूँ

सफीना कागजों का था
लहर से हम कहें कुछ यूँ

नशेमन नम न हो कोई
नयन अपने बहें कुछ यूँ

सितारें खोज लें हमको
अँधेरों में रहें कुछ यूँ

रियावत - परंपरा
सफीना - नाव
नशेमन - घोंसला

पूनम शुक्ला
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 928

Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 26, 2013 at 12:51pm

छोटी बहर पर बहुत सुन्दर ग़ज़ल 

हार्दिक शुभकामनाएं आ० पूनम जी 

Comment by वीनस केसरी on September 26, 2013 at 2:57am

सफीना कागजों का था
लहर से हम कहें कुछ यूँ

नशेमन नम न हो कोई
नयन अपने बहें कुछ यूँ

वाह वा छोटी बहर में आपने गागर में सागर भर दिया
हार्दिक बधाई

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on September 25, 2013 at 2:18pm

सितारें खोज लें हमको
अँधेरों में रहें कुछ यूँ // वाह्ह क्या जज्बा है, बधाई सुन्दर गजल के लिए आदरणीया। 

Comment by Vindu Babu on September 24, 2013 at 4:09pm
गजल का कथ्य बहुत अच्छा लगा आदरेया।
सादर बधाई आपको!
सादर
Comment by Parveen Malik on September 24, 2013 at 12:17pm
पूनम जी गागर में सागर भर दिया आपने तो ... हार्दिक बधाई लिजिये !
Comment by shashi purwar on September 24, 2013 at 11:02am

waah sundar bhav

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 24, 2013 at 10:53am

वाह क्या कहने पूनम जी छोटी बहर में खूबसूरत गजल अच्छा प्रयास दाद कुबूल फरमाएं.

Comment by राज़ नवादवी on September 24, 2013 at 7:51am

वाह!

Comment by vijay nikore on September 23, 2013 at 6:16pm

गज़ल अच्छी लगी। बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 23, 2013 at 11:40am

आदरणीय सौरभ भाई , आदरणीय सलीम भाई , आप दोनो का बहुत आभार अँधेरा और अन्धेरा का अंतर अब साफ हो गया , आप दोनो का पुनः धन्यवाद !!

कृपया ध्यान दे...

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