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मन की अंतर्वेदना , कहीं बह ना जाए आंसुओ में !

बहुत टुटा हूँ ,समेट लो बाजुओं में !

अपमान के ना जाने कितने घूंट पी चूका !

पर प्यासा हूँ , डूब जाने दो आँखों में !

घना होता जाता है ये अन्धकार क्यों ?

एक दिया तो उम्मीद का जलाओ रातो में !

तिरस्कार किया गया , हिकारत से देखा गया !

ना जाने कैसा भाग्य है मेरे इन हाथो में !

लौट जाओ कि अब रंगीन जवानी गुजर चुकी !

हासिल होगा क्या  अब इन मुलाकातों में !

आदत सी हो गयी है जख्मो पे मरहम न लगा !

बार बार उपहार सरीखे मिलते है मुझे आघातों में !

भोर हो गयी है , निंद्रा टूट गयी है !

वरना बर्बाद बहुत हुआ हूँ तेरे वादों में !

-----------डॉ. अनुराग सैनी ------------

मौलिक व अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 27, 2013 at 7:17am

 //गज़ल लिखना तो शायद बस में नही है //

आदरणीय अनुराग भाई , ऐसी बात बिलकुल नही है आप भी प्रयास करें तो ग़ज़ल लिख सकते है , बस एक बार तय कर लीजिये सीखना है तो सीख जायेंगे , ये ओबीओ का मंच  सौभाग्य से मिलता है , मेरी प्रार्थना है फायदा उठा लीजिये ! आप बहुत गुणी लोगों के बीच है !! सादर !!

Comment by बृजेश नीरज on September 26, 2013 at 10:05pm

जब रचना ऐसी हो कि वो विधा विशेष की लगे पर हो न और उस पर भी रचनाकार की तरफ से ये उल्लेख न हो कि वास्तव में उसने क्या रचने का प्रयास किया है तो पाठक के लिए मुश्किल ही होती है कि वो रचना पर क्या कहे, खासकर ओबीओ जैसे मंच पर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 26, 2013 at 9:01pm

भावों को शिल्प का आवरण भी देने का प्रयत्न करें आदरणीय ताकि सम्प्रेषण प्रभाव छोड़ने में सक्षम हो... 

सादर शुभेच्छाएँ 

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on September 25, 2013 at 6:50pm

आदरणीय गज़ल लिखना तो शायद बस में नही है क्योंकि इस फन की समझ नही है बस एक शौंक है लिखने का , आप सभी के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन की आकांक्षा सदैव रहेगी ! बहुत आभार सभी का !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 25, 2013 at 5:43pm

आदरणीय अनुराग भाई , सुन्दर रच्ना के लिये आपको बहुत बधाई !!

Comment by Saarthi Baidyanath on September 25, 2013 at 5:10pm

बहुत बढ़िया .... कोशिश को प्रणाम ..! लिखते रहिये साहब :)

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on September 25, 2013 at 3:02pm

आभार आप सभी महानुभावो का !

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 25, 2013 at 2:46pm

आदरणीय प्रयास अच्छा है किन्तु बहर और शिल्प पर आपको ध्यान देना है रचना आपसे श्रम की मांग कर रही है प्रयासरत रहें साथ ही साथ यहीं ओ बी ओ पर पाठशाला में जाकर ग़ज़ल की कक्षा या ग़ज़ल की बातें का अनुसरण कर ग़ज़ल सीखें. आप जल्द ही सुधार महसूस करेंगे. इस प्रयास पर बधाई

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on September 25, 2013 at 1:48pm

प्रयास अच्छा है आदरणीय डाक्टर साहब। बधाई। बह्र और कहन में सुधार की गुंजाईश हमेशा होती है, इस लिहाज से आप पुनर्विचार कर लें। आभार।

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