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बर्ताव
बर्ताव का अर्थ -- स्पर्श !
मुलायम नहीं..
गुदाज़ लोथड़ों में
लगातार धँसते जाने की बेरहम ज़िद्दी आदत

तीन-तीन अंधे पहरों में से
कुछेक लम्हें ले लेने भर से
बात बनी ही कहाँ है कभी ?


चाहिये-चाहिये-चाहिये.. और और और चाहिये
सुन्न पड़ जाने की अशक्तता तक
बस चाहिये

आगे,
देर गयी रात 

उन तीन पहरों की कई-कई आँधियों के बाद 
लोथड़े की
तेज़धार चाकू की निर्दयी नोंक
खरबूजा-खरबूजा खेलती है
सुन्न पड़े के साथ
बेमतलब सी भोर होने तक.

*******************************

-सौरभ

(मौलिक और अप्रकाशित)

 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 6, 2013 at 9:55am

आदरणीय विजय जी, सकारात्मक अनुमोदन के लिए सादर धन्यवाद. मन प्रसन्न है.

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 6, 2013 at 9:53am

आदरणीया कल्पनाजी,

आपकी संवेदनशीलता इस कविता के सार्थक आयाम को स्पष्ट कर रही है. आपका अनुमोदन और बेहतर करने की प्रेरणा देता है.

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 6, 2013 at 9:42am

आदरीय मुकेश जी, आपका हृदय प्रस्तुत कविता की भावदशा से उद्विग्न हुआ यह कविता की सार्थकता है.

सादर धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 6, 2013 at 9:40am

आदरणीया प्राचीजी, आपको प्रस्तुत कविता की अंतर्दशा के भाव सार्थक लगे  मेरे रचनाकर्म को मिला अनुमोदन है. हार्दिक धन्यवाद.

Comment by vijay nikore on October 28, 2013 at 5:28am

पीड़ा की पृष्ठभूमि में मानवीय संबंधों से आई अन्तर्वेदना को आपने सुन्दर अभिव्यक्ति दी है।

हार्दिक बधाई।

Comment by कल्पना रामानी on October 19, 2013 at 6:38pm

इतने मर्मभेदी शब्द!!! पढ़ते ही रोंगटे खड़े हो गए। क्या वो समाज इतना बेरहम वहशी होता है,  हम सबसे अलग? जिसके ऊपर बीतती है, उसकी आहें उन नृशंसों का वंश क्यों नहीं मिटा देतीं? 

Comment by Mukesh Kumar Sinha on October 18, 2013 at 2:22pm

uff............. mere pas shabd nahi hai !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 18, 2013 at 9:30am

आदरणीय सौरभ जी 

रोंगटे खड़े करती.. संवेदनाओं के अंतरतम तारों को झटके देकर सिहराती.. शाब्दिक अर्थों में बर्बरतापूर्ण बलात्कार को चिंघाड़ती दिल दहला देने वाली अभिव्यक्ति...

पर बलात्कार कब सिर्फ शारीरिक हुआ है? इस इंगित के माध्यम से मन, आत्मा, चिंतन, समझ, व्यक्तित्व तक का 'बर्ताव' द्वारा धज्जी धज्जी, चीथड़े चीथड़े उधेडा जाना जिस पीड़ा के साथ प्रस्तुत हुआ है.. वह सिहराने वाली है.

सादर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 17, 2013 at 4:53pm

आदरणीय अखिलेशजी,

यह घनी अँधेरी रात की वारदात इसी समाज का हिस्सा हैं. इसी समाज ऐसे अधिकांश लोग हैं जो ऐसा, वर्ना.. की शर्त पर सम्बन्ध जीते हैं. और हम निभाने को विवश हैं.

आप द्वारा इस रचना के मर्म को छूने का प्रयास मुझे नत कर रहा है. हार्दिक धन्यवाद. 

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 17, 2013 at 4:47pm

भाई चन्द्रशेखरजी, आपने जिस सहजता से प्रस्तुत रचना की सार्थक व्याख्या की है, वह आपके जागरुक कवि के साथ-साथ आपके सचेत पाठक से भी हमारा परिचय करा रहा है. आपकी रचनाधर्मिता, जिसका एक महत्त्वपूर्ण अंग वाचन भी है, को मैं हृदय से स्वीकार कर सम्मानित महसूस कर रहा हूँ.
बहुत-बहुत धन्यवाद, भाई
शुभ-शुभ

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