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लेख :- जाना बालेश्वर का

लेख :-जाना बालेश्वर का

प्रख्यात लोक गायक बालेश्वर यादव का दिनांक ०९ जनवरी २०११ को लखनऊ में निधन हो गया | धन्य हो कुछ खबरिया चैनेलों का और अखबारों का जो उनके प्रशंसक इस समाचार  वाकिफ हो सके | अन्यथा आज भोजपुरी संस्कृति जिस बाजारवाद की शिकार है उसमें इन पारंपरिक लोकगायकों को लोग भूल गये हैं | बालेश्वर १९४२ में मऊ जनपद में जन्में मुझे याद है मेरा गांव में गुज़रा बचपन जहां उनका 'निक लागे टिकुलिया गोरखपुर के '...'सीमा के जवनवा जागा'....'जब कटहर के कोआ ..' ...आदि गीत बजते तो रग रग में रवानगी छा जाती थी | 'रे रे रे रे रे रे ...' (टेर और अलाप ) का उनका अपना अलग अंदाज़ था |इस महान लोक गायक को विनम्र श्रद्धांजलि |

आज भी ऐसा लगता है कि हीरा लाल यादव , बुल्लू यादव , राम् देव ,भरत शर्मा व्यास ,शारदा सिन्हा , राम कैलास , मन्ना लाल , और जवाहर लाल सरीखे अनेक लोग गायकों को वह प्रतिष्ठा नहीं मिली जो मिलनी चाहिए थी | भक्ति ,श्रृंगार और सामाजिक तथा वीर रस के इनके गाये गीतों में वो तासीर है की सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाये | इन लोक गायकों ने गांव - गांव ,विविध तीज त्यौहार और अन्य व्यक्तिगत सामाजिक आयोजनों में अपनी लोक लुभावन प्रस्तुतियों से एक प्रकार से लोक गायन की परंपरा को जीवित रखा है | वर्ना आज रेडियो - टी.वी. , रीमिक्स और अश्लीलता के युग में खालिस लोक कलाएं दम तोड़ रही हैं | आज एक गीत 'निरहुआ सटल रहे ' गाकर दिनेश लाल यादव स्टार हो गये और देवी गीत गाकर अपना करियर शुरू करने वाले मनोज तिवारी तो राष्ट्रीय स्तर पर मनोरंजक चैनलों में भोजपुरी दुनिया के कथित प्रतिनिधि बन मुंबई में बस ही गये | सभी फिल्म अभिनेता हो गये लोक गायन पीछे छूट गया | महुआ जैसे चैनेल बड़ी आस से खुले थे परन्तु वे भी डांस संग्राम जैसे शो में उलझकर रह गये |  साथ ही भोजपुरी के ज़रिये समाज को जोड़ने के स्थान पर सुर संग्राम के नाम पर यू.पी. बिहार में संग्राम करा रहे हैं | सी.डी.-कसेट कंपनियां भी वही परोस रही हैं जो बिकता है |

इस बाज़ार ने जहां मूल्यों को तिलांजलि देने वाले नए कलाकारों को करोड़पति बना दिया वही पुराने आदर्शवान देशभक्त लोकगायकों को और पीछे धकेल दिया | बिरहा , कजली .आल्हा,लोरिकायन के आयोजन अब नहीं होते बार बालाएं नृत्य करती हैं और लोक के नाम पर भोंडे गीत बजते हैं | यह स्थिति दुखद है और इसके लिये हम सब दोषी हैं |

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Comment by Abhinav Arun on January 21, 2011 at 12:42pm
आशीष जी आपके शब्द मुझे भी बल देते हैं , शुक्रिया !
Comment by आशीष यादव on January 20, 2011 at 11:54am
मुझे कभी बालेश्वर जी को देखने का शुभ अवसर तो प्राप्त नहीं हुवा लेकिन उनके बारे में बहुत कुछ सुनने को मिलता है| मै एक खाटी देहात का रहने वाला हूँ| हमारे यहाँ बिरहा जैसे कार्यक्रम लगभग हमेशा ही होते रहे है लकिन अब यह भी सही है की इन कुच्छ दिनों में इनमें कुछ कमी आई है| जब बिजय लाल यादव जैसे बिरहा गायक भी अब इस कला से मुह मोड़ते नजर आ रहे है| जब भी बिरहा आदि का नाम आता है तो बलेसर नाम जरुर सुनने को मिलता है|
Comment by Abhinav Arun on January 12, 2011 at 4:21pm
आदरणीय शेष जी और भाई नवीन जी आपकी प्रतिक्रियाओं ने मेरी सोच को बल दिया है और लिखते पढ़ने की उर्जा भी ...आभारी हूँ.|

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