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कैसा ये जीवन हुआ, दिन प्रति बढ़े विकार

लोभ, मोह, मद, दंभ भी, नित लेते आकार  

नित लेते आकार, स्वार्थ के सर्प अनूठे

बाँट रहे संदेह, नेह के बंधन झूठे

मन में फैली रेह, भाव है ठूंठों जैसा

संवेदन अब शून्य, मूल्य संस्कृति का कैसा

                - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश नीरज on October 29, 2013 at 10:40pm

आदरणीया प्राची जी आपका हार्दिक आभार!

'ठूंठों' शब्द के प्रयोग पर मुझे भी संशय निवारण की प्रतीक्षा रहेगी. वैसे मेरा मंतव्य यहाँ ये था की हर भाव ठूंठ के जैसा है, इसीलिए 'ठूंठों' शब्द का प्रयोग किया.

सादर! 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 29, 2013 at 7:34pm

आदरणीय बृजेश जी 

सुन्दर छन्द रचना हुई है..दोहा अंश तो बेहद सामिक यथार्थ शब्द चित्र प्रस्तुत करता है..

कैसा ये जीवन हुआ, दिन प्रति बढ़े विकार

लोभ, मोह, मद, दंभ भी, नित लेते आकार 

नित लेते आकार, स्वार्थ के सर्प अनूठे...........................स्वार्थ के सर्प .....वाह! सुन्दर 

बाँट रहे संदेह, नेह के बंधन झूठे

मन में फैली रेह, भाव है ठूंठों जैसा................................भाव के साथ ठूंठों फिर जैसा ....भाव और जैसा तो एक वचन हैं पर ठूंठों बहुवचन शब्द है.. शायद यह व्याकरणीय रूप से अशुद्ध हो.. सुधिजनों से इस संशय का निवारण अपेक्षित है.

संवेदन अब शून्य, मूल्य संस्कृति का कैसा

सादर शुभकामनाएं 

Comment by बृजेश नीरज on October 24, 2013 at 8:42pm

आदरणीय सुशील जी आपका हार्दिक आभार! सच कहूं तो इस ओर वास्तव में मेरा ध्यान ही नहीं गया! इस सुझाव हेतु आपका हार्दिक आभार!

Comment by Sushil.Joshi on October 24, 2013 at 7:46pm

बहुत ही सुंदर एवं सार्थक छंद है आ0 बृजेश जी..... बस मुझे लगता है कि दोहे के द्वितीय चरण में 'दिन प्रति' के क्रम की अदला बदली कर क्रमश: 'प्रति दिन' कर दिया जाए तो और अधिक लयबद्ध हो जाएगा.... वैसे यह मेरा निजी विचार है.....

कैसा ये जीवन हुआ, प्रति दिन बढ़े विकार।

लोभ, मोह, मद, दंभ भी, नित लेते आकार।। ........

Comment by बृजेश नीरज on October 23, 2013 at 9:46pm

आदरणीया कुंती जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 23, 2013 at 9:45pm

आदरणीय राम भाई आपको दो बार बहुत बहुत धन्यवाद!

Comment by ram shiromani pathak on October 23, 2013 at 8:40pm

वाह वाह बहुत ही सुन्दर कुण्डलियाँ छंद आदरणीय भाई ब्रिजेश जी //हार्दिक बधाई आपको 

Comment by ram shiromani pathak on October 23, 2013 at 4:47pm

आदरणीय बृजेश भाई,बहुत सुन्दर कुंडलिया //बहुत बधाई आपको 

Comment by coontee mukerji on October 23, 2013 at 2:22pm

मन में फैली रेह, भाव है ठूंठों जैसा

संवेदन अब शून्य, मूल्य संस्कृति का कैसा.....बहुत सुंदर एवम सटीक.बृजेश जी.शुभकामनाएँ सहित

कुंती.

Comment by बृजेश नीरज on October 22, 2013 at 7:15am

आदरणीय अनुराग जी आपका हार्दिक आभार!

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