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ग़र साथ नहीं तेरी किस्मतें...

 
यूँ तो उड़ सकता है कोई कागज़ का पुर्ज़ा भी
पैर ज़मीन पर पसारे,
कभी कभी भाग्य के सहारे,
लेकिन उड़ नहीं पाता वही कागज़,
ऊंचाई से भी
जो हो ना भाग्य का साथ |
 
किन्तु , हम उड़ा सकते हैं
उसी कागज़ की पतंग को
बाँध हिम्मत की कन्नी,
कहीं से भी
अपनी कोशिशों के सहारे |
 
ग़र साथ नहीं तेरी किस्मतें,
ना टूटने देना तेरी हिम्मतें |
ना छोड़ना तू साहस
हैं कोशिशें तेरी, तेरे साथ,
आज नहीं तो कल
लगेगी सफलता तेरे हाथ |

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 13, 2011 at 8:11pm
किन्तु , हम उड़ा सकते हैं
उसी कागज़ की पतंग को
बाँध हिम्मत की कन्नी,
कहीं से भी
अपनी कोशिशों के सहारे |
बहुत बढ़िया वीरेंदर साहब, बेहतरीन अभिव्यक्ति, आपने बिलकुल सही कहा है कि हिम्मत और कोशिश हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है , खुबसूरत कविता हेतु बधाई आपको |
Comment by Raju on January 13, 2011 at 8:09pm
bahut hi badhiya....aur utsah ko badhane wali kavita likhi hai .......bahu bahut Dhanywaad
Comment by विवेक मिश्र on January 13, 2011 at 2:32pm
खूबसूरत ख्याल हैं वीरेंद्र जी. हार्दिक बधाई.

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