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ग़ज़ल : वो पगली बुतों में ख़ुदा चाहती है

बह्र : फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

 

मेरे संगदिल में रहा चाहती है

वो पगली बुतों में ख़ुदा चाहती है

 

सदा सच कहूँ वायदा चाहती है

वो शौहर नहीं आइना चाहती है

 

उतारू है करने पे सारी ख़ताएँ

नज़र उम्र भर की सजा चाहती है

 

बुझाने क्यूँ लगती है लौ कौन जाने

चरागों को जब जब हवा चाहती है

 

न दो दिल के बदले में दिल, बुद्धि कहती

मुई इश्क में भी नफ़ा चाहती है

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 7, 2014 at 10:24pm

बहुत बहुत शुक्रिया Neeraj Mishra "प्रेम"जी

Comment by Neeraj Nishchal on November 22, 2013 at 10:38pm
सच मेँ बहुत खुबसूरत
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 10:35pm

बहुत बहुत धन्यवाद  Saurabh Pandey जी। क्यूँ को गिराकर पढ़ा जा सकता है। कई जगह मैंने पढ़ा है। उदाहरण के लिए गुलज़ार साहब की ये ग़ज़ल दे रहा हूँ।

बह्र : २२१२ १२११ २२१२ १२

आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँ 
उठता तो है घटा-सा बरसता नहीं धुआँ 

चूल्हे नहीं जलाये या बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गये हैं अब उठता नहीं धुआँ 

आँखों के पोंछने से लगा आँच का पता 
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ 

आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं 
मेहमाँ ये घर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 9:48pm

बहुत बहुत धन्यवाद रमेश कुमार चौहान जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 9:48pm

बहुत बहुत धन्यवाद Nilesh Shevgaonkar जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 9:47pm

VISHAAL CHARCHCHIT जी, बहुत बहुत शुक्रिया जनाब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 9:47pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय vijay nikore जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 9:45pm

बहुत बहुत धन्यवाद Sushil.Joshi जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 9:44pm

बहुत बहुत धन्यवाद जितेन्द्र 'गीत' जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 9:25pm

बहुत बहुत शुक्रिया ram shiromani pathak जी

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