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चलो आज कुछ ऐसा सोचें। 

रोज़ नहीं हम जैसा सोचें

नींद उड़ा दे जो रातों की

सपना कोई ऐसा सोचें

बनती बात बिगड़ ही जाए

एक बहाना ऐसा सोचें

खाली हाथ चला जाए वो।

नज़राना ही कुछ ऐसा सोचे।।

ना हो पाये मुकम्मल सौदा।

बयाना ही कुछ ऐसा सोचें॥

दूर रहे वो सदा सर्वदा

हमजोली कोई ऐसा सोचें

प्यास मिटा ना सके किसी की।

अमृत कोई ऐसा सोचें॥

क्यों नाहक हम हक़ की सोचें।

सोचें तो बेहक़ की सोचें॥

हमे पूजता रहे प्रदीप हमेशा

शागिर्द ही कोई ऐसा सोचें

                                  प्रदीप चौहान

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Comment

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 15, 2011 at 1:56pm
भाई प्रदीप चौहान जी, इस बहुत ही सुन्दर काव्य-अभिव्यक्ति के लिए दिल से साधुवाद है आपको !

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 15, 2011 at 1:34pm
बहुत खूब, श्री प्रदीप चौहान जी , ओपन बुक्स ऑनलाइन के मंच पर आपके पहले सोच का ह्रदय से स्वागत है , जबरदस्त सोचा है आपने, बेहतरीन अभिव्यक्ति, बेहतरीन कृति हेतु बधाई स्वीकार करे |

कृपया ध्यान दे...

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