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मिट्टी का बर्तन..! ( अतुकांत )

सुन..! मेरे मिट्टी के बर्तन,

तू अपनी असलियत को पहचान

इस संसार की झूठी, खोखली वाहवाही से

परे रहना

अपनी गहराई से ज्यादा, अनुपयोगी द्रव्य को

मत सहेजना, ढुल जाता है..

 

इक दिन निकल गया मैं

किसी के कहने पर

इक नयी मिट्टी का बर्तन बनाने

उस मिटटी में सौंधी खुसबु,

रंग मेरी मिट्टी की ही तरह, साँवला

हुबहू.... मेरे जैसी ही मिट्टी

पर शायद तनिक, कंकरियां मिली थीं,

 

उससे न बना पाया,बर्तन

बनने से पहले ही

बिखर गया..टूट गया

मेरा मिट्टी का बर्तन...!

 

    जितेन्द्र ' गीत '

  

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by अरुन 'अनन्त' on November 6, 2013 at 2:54pm

आदरणीय जीतेंद्र भाई जी भावपक्ष बेहद सुन्दर है बहुत ही पसंद आया आदरणीय बृजेश भाई जी की बातों पर ध्यान दें इस प्रस्तुति के बधाई स्वीकारें.

Comment by Meena Pathak on November 6, 2013 at 1:08pm

सुन्दर रचना | बधाई आप को 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 6, 2013 at 11:32am

आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय अखिलेश जी, स्नेह व् आशीर्वाद बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 5, 2013 at 9:44am

सुन्दर और सार्थक रचना | थोड़ा और समय देकर आ. कुन्तिजी की टिपण्णी अनुरूप संजोये सादर |

Comment by Neeraj Nishchal on November 4, 2013 at 9:48pm

सुन..! मेरे मिट्टी के बर्तन,

तू अपनी असलियत को पहचान

इस संसार की झूठी, खोखली वाहवाही से

परे रहना

आदरणीय जीतेन्द्र भाई बहुत ही सुन्दर रचना
बहुत सारी बधाइयां आपको इस के लिए

Comment by ram shiromani pathak on November 4, 2013 at 3:45pm

बहुत ही  सुन्दर  प्रस्तुति  भाई  जितेन्द्र जी,आपको हार्दिक बधाई!

Comment by coontee mukerji on November 4, 2013 at 2:08pm

सुन..! मेरे मिट्टी के बर्तन,

तू अपनी असलियत को पहचान

इस संसार की झूठी, खोखली वाहवाही से

परे रहना

अपनी गहराई से ज्यादा, अनुपयोगी द्रव्य को

मत सहेजना, ढुल जाता है..........जितेंद्र जी, अपनी कविता के माध्यम से आपने अच्छा संदेश देने की कोशिश की है.बधाई.....लेकिन एक बात ध्यान रखियेगा जितना दोष बर्तन में पाया जाता है उससे कहीं ज्यादा दोष कुम्हार में होता है.

 

इक दिन निकल गया मैं

किसी के कहने पर

इक नयी मिट्टी का बर्तन बनाने

उस मिटटी में सौंधी खुसबु,

रंग मेरी मिट्टी की ही तरह, साँवला

हुबहू.... मेरे जैसी ही मिट्टी

पर शायद तनिक, कंकरियां मिली थीं.........इन पंक्तियों से कुम्हार की अपरिपक्वता जाहीर होती है. कभी सुन के कोई भी बुध्दिमान व्यक्ति कोई कार्य नहीं करता है

.

उससे न बना पाया,बर्तन

बनने से पहले ही

बिखर गया..टूट गया

मेरा मिट्टी का बर्तन...!........कुम्हार ब्रम्हा होता है बर्तन सृष्टि.

शुभकामनाएँ सहित

कुंती

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 4, 2013 at 1:46pm

 छोटी छोटी  पंक्तियों में सुंदर भाव के साथ अच्छी प्रस्तुति की बधाई जितेन्द्र भाई।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 4, 2013 at 10:15am

आदरणीय रमेश जी, आपका बहुत बहुत आभार, स्नेह व् आशीर्वाद बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 4, 2013 at 10:14am

आदरणीय अरुण निगम जी, आपने अपना अमूल्य समय देकर रचना पर दृष्टी डाली, आपका बहुत बहुत आभार, स्नेह व् आशीर्वाद बनाये रखियेगा

सादर!

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