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ग़ज़ल - जादुई बात थी सजाओं में - पूनम शुक्ला

2122. 1212. 22

जाने क्या बात है हवाओं में
मीठी मिश्री घुली सदाओं में

ऐसी वैसी नहीं ये रातें हैं
चाँदनी खोजतीं खलाओं में

शबनमी रात ने कहा कुछ है
कुछ नई बात है सबाओं में

रात का है असर अभी ऐसा
जामुनी रंग है अदाओं में

रोशनी छीन ले जो वो मेरी
ऐसी ताकत नहीं ज़फाओं में

जिन्दगी आज सोचती है ये
जादुई बात थी सजाओं में

पूनम शुक्ला

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on November 13, 2013 at 4:10pm
सुन्दर कोशिश।
हार्दिक बधाईयाँ
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 13, 2013 at 12:16pm

पूनम जी

आप कितनी  क्षिप्रता से लिखती है

हमेशा ब्लॉग पर पोस्ट रहती है

न जाने  कितनी आग है आप में

सचमुच ------- जब तक मन  में आग तभी तक होठ कलम के गीले है     बहुत अच्छी गजल i

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